सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
DevanagariHindipublished723 पृष्ठ
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ढयति—सव्यापसव्यमिति । ऋक्षचक्रम् । ध्रुवद्वयसमान्तरितभा-Wait, look at "पुनर्दृढयति" or "पुनर्द्रढयति"?पुनर्द्रढयति->पु न र्द्र ढ य ति(punardraḍhayati). Then—सव्यापसव्यमिति । ऋक्षचक्रम् । ध्रुवद्वयसमान्तरितभा-`
Line 18:
विष्ठितगोलमध्यवृत्तं भ्रमत् । पश्चिमाभिमुखमनवरतं भ्रममाणं क्षितिजप्रसक्तम् । तद-
Wait, "भाविष्ठित-" or "भाधिष्ठित-"?
Look at line 17-18: भा- / विष्ठित or धिष्ठित?
Wait, "ध्रुवद्वयसमान्तरितभाविष्ठित-"? No, धिष्ठित! Look at line 18, first word:
विष्ठित? Wait, धि has a loop: धिष्ठित or विष्ठित?
Wait, in line 17: भा-
line 18: विष्ठित? But भा + विष्ठित? Or भाविष्ठित?
Wait, what word is भाविष्ठित? Could it be `