भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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भुवनकोशः ९३ इस प्रकार १ क्रोश = २००० दण्ड = ८००० हाथ की दूरी को एक क्रोश कहा गया है । वर्त्तमान में दो हाथ = १ गज = ३ फीट मान से ८००० हाथ = ४००० गज = १२००० फीट = का एक योजन होता है । १७६० गज का १ मील होने से १२००० / १७६० = १२०० / १७६ = ६ ६/७ मील = १ योजन कहा जाना चाहिए । स्वल्पान्तरित गणित से ७ मील = १ योजन भी कह सकते हैं । अतः उक्त १५८१ १/२४ योजन = १५८१ १/२४ × ७ = ११०६७ ७/२४ मील में पृथ्वी की निरक्षदेशीय भूपरिधि का मान सिद्ध होता है । आचार्य ने भू व्यास का मान १५८१ १/२४ योजन की कल्पना अंगुल, हाथ, आदि कल्पना के आधार से स्वीकार की है । क्वचित् ग्रन्थों में योजनों का मीलों में परिवर्त्तन करने से ५ मील = १ एक योजन भी सही हो रहा है । अतः १५८१ १/२४ × ५ = ७९०५ ५/२४ मीलों में भू परिधि मान ठीक उतरता है । उक्त त्रैराशिक से व्यास × ३९२७ / १२५० = सूक्ष्म परिधि तथा, व्यास × २२ / ७ = उपरोक्त स्थूल परिधि मान स्पष्ट होता है ॥५१-५२॥ लल्लोक्तस्य नगशिलीमुखबाणभुजंगमेत्या भूपृष्ठफलस्य दूषणमाह— दुष्टं कन्दुकपृष्ठजालवदिलागोले फलं जल्पितं लल्लेनास्य शतांशकोऽपि न भवेद्यस्मात्फलं वास्तवम् । तत्प्रत्यक्षविरुद्धमुद्धतमिदं नैवास्तु वा वस्तु वा हे प्रौढा गणका विचारयत तन्मध्यस्थबुद्ध्या भृशम् ॥५३॥ वा० भा०—यल्लल्लोक्तं भूपृष्ठफलं तद्दुष्टम् । यतस्तदुक्तफलस्य शतांशकोऽपि पारमार्थिकं फलं न भवति । अत्यन्तं दुष्टमित्यर्थः । कुतो यतस्तत्प्रत्यक्षविरुद्धम् । प्रत्यक्षबाधो हि महादूषणम् । अथाऽऽत्मन औद्धत्याशङ्कां परिहरन्नाह—इदं मदुक्तं नैवोद्धतं किंतु वस्तु परमार्थः । अथवा किं शपथपरिहारेण । उद्धतमस्तु वा वस्तु वा । हे प्रौढा गणका मध्यस्थबुद्ध्या विचारयत । भृशमत्यर्थम् ॥५३॥ मरीचिः—ननु परिधिकथने विशेषावगमार्थं व्यासकथनं प्रसङ्गात्तद्युक्तम् । परन्तु