सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यगतिवासना ११५ १. भूवायुगोल जिसे आवह कहते हैं और वह जो भूपरिधि के साथ क्रियाशील है, अर्थात् यह वायु पृथ्वी के सभी पूर्वापरादि दशों दिशाओं में प्रगतिशील हैं। २. भू वायु गोल के ऊपर दूसरा प्रवह नामक गोल में प्रवह वायु चलता है। ३. प्रवह वायु गोल के ऊपर उद्वह संज्ञक वायु गोल है। ४. उद्वह संज्ञक वायु गोल के ऊपर में संवह संज्ञक वायु गोल है। ५. संवह संज्ञक वायु गोल के ऊपर 'सुवहं' संज्ञक वायु गोल है। ६. 'सुबह' संज्ञक वायु गोल के ऊपर परिवह संज्ञक वायु गोल है। ७. परिवह संज्ञक वायु गोल के ऊपर परावह संज्ञक वायु गोल हैं। पृथ्वी से नियत स्थानीय परावह वायु संज्ञक गोल के ऊपर में वायु का अभाव होने से तदुपरि के समीपग चन्द्र बिम्ब में वायु का अभाव स्वयं सिद्ध होता है ॥१॥ भूमि के ऊपर १२ योजन लगभग भूपृष्ठ से ६० मील ऊपर में की दूरी पर भूवायु गोल मण्डल में सजल मेघ, विद्युत, इन्द्र धनुष, गन्धर्व नगर आदि पदार्थ रहते हैं। भूवायुगोल मण्डल के ऊपर प्रवह वायु मण्डल है और इस प्रवह वायु मण्डल का नित्य पृथ्वी के चारों तरफ प्रत्यक् गमन (पश्चिमाऽभिमुख) पश्चिम भ्रमण होता है। प्रवह वायु की गति एक रूपा स्थिरात्मिका मध्यमागति होती है ॥२॥ नक्षत्र और ग्रहों से युक्त यह भचक्र नित्य प्रवह वायु के वेग से पूर्व से पश्चिमाभि- मुख भ्रमण करता रहता है। अपनी-अपनी कक्षाओं में स्थित सूर्यादि सात ग्रहों के साथ अनन्त संख्यक नक्षत्रों में प्रसिद्ध अश्विनी से रेवती तक २७ नक्षत्रों के साथ यह भचक्र प्रतिक्षण प्रवह वायु के वेग से भ्रमण करता देखा जाता है। इस भचक्रमें २७ नक्षत्रों में किसी भी नक्षत्र की स्वयं की गति सत्ता नहीं है। गति शून्यता के कारण इन तारकापुञ्जों की संज्ञा नक्षत्र संज्ञा कही गई है। तथा इस भचक्र स्थित प्रवह वायु की गति के साथ स्वयं की गति से गमन शील होने से प्रत्येक ग्रह अपनी कक्षा में प्रतिक्षण विलक्षण गति के साथ पूर्वाभि- मुख गमन करता है ॥३॥ इदानीं ग्रहाणां पूर्वगतिमनुपलक्षितामपि दृष्टान्तेन दृढीकुर्वन्नाह— यान्तो भचक्रे लघुपूूर्वगत्या खेटास्तु तस्यापरशीघ्रगत्या । कुलालचक्रभ्रमिवामगत्या यान्तो न कीटा इव भान्ति यान्तः ॥४॥ वा० भा०—स्पष्टम् ॥४॥ मरीचिः—अथाश्विनीस्थग्रहस्य कालान्तरे भरण्यादिस्थत्वदर्शनान्यथानुपपत्त्या ततो- ऽपराशाभिमुखं भपञ्जर इत्यादिनाेक्तग्रहपूर्वगतिरसङ्गता प्रत्यक्षत्वाभावादित्यतस्तामुपजाति- कया द्रढयति—यान्त इति। खेटा ग्रहास्तस्य भपञ्जरस्यापरशीघ्रगत्या पश्चिमदिगभि-