सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 22, कुल 723 में से
संदर्भ में पढ़ें( १५ ) जिसके समग्रगणित व्यवहार दोष शून्य हैं, ऐसी सर्वांग शुद्ध लीलावती नाम की पुस्तिका जिन्हें कण्ठस्थ हो उनकी सुखद गणित सम्पत्ति सदा वर्धमान होती है । अथवा और भी एक अत्यन्त स्पष्ट अर्थ होता है कि, सुन्दर गुण, वर्ग जाति आदि से विभूषित अंग की, अत्यन्त पवित्र व्यवहार युक्त कण्ठसक्ता (स्त्री, वामा, भार्या, अर्द्धाङ्गिनी) पति प्रिया तथा विनोद जिसमें विद्यमान हो ऐसी सुन्दर सरस भाषिणी या सुन्दर सरस युक्तियों की दृष्टांत दायिका लीलावती (भार्या) गृहिणी अपने अति सुन्दर रूप से जिन गृहस्थों के घरों को अलंकृत करती है, उन गृहपतियों की सुख सम्पत्तियाँ (पुत्र, मित्र, बन्धु, लक्ष्मी) सदैव वर्द्धमान और स्थिर होती हैं। जैसे - "येषां सुजातिगुणवर्गविभूषिताङ्गी शुद्धाखिलव्यवहृतिः खलु कण्ठसक्ता । लीलावतीह सरसोक्तिमुदाहरन्ती तेषां सदैव सुखसम्पदुपैति वृद्धिम् ॥" इस प्रकार हम यह देखते हैं कि भास्कराचार्य की इस प्राचीन शुद्ध अंकगणित प्रक्रिया के नवीन अविष्कारों से सुसज्जित ग्रन्थ का नाम स्त्रीलिङ्ग में अति सुन्दर "लीलावती" नामकरण आचार्य ने अपनी अनन्य प्रियतमा आर्द्धाङ्गिनी पतिलीला- नुरागिणी के लिये किया है। फलतः लीलावती नाम्नी महागणित विदुषी आचार्य भास्कर की धर्म पत्नी हो सकती है या कही जानी चाहिये । एक संभावित कल्पना यह भी हो सकती है कि ऐसी महान् विभूतियों में लौकिक सम्पत्ति कम देखी गई है। अनपत्य (सन्तानहीन) होने से भी पति पत्नी का या पुरुष प्रकृति का ब्रह्म रूप में साक्षात् विलय हो जाता है, जैसा भास्कराचार्य को भी यदि हुआ होगा तो भी राष्ट्र की भविष्य की समग्र शिक्षित सन्तानें उन्हें स्मरण करती हुई दीर्घ समय तक अपनी श्रद्धाञ्जलियां समर्पण करती रहेंगी। जैसा भास्कराचार्य के जन्म शक १०३६ से आज के वर्तमान शक १८८५ तक प्रत्येक शताब्दी से भास्कराचार्य के ग्रहगणित को आधार मानकर अपनी-अपनी बहुविध रचनाओं से विद्वानों ने आचार्य का धवल यश दिग्दिगन्त तक पहुँचाया है।
सिद्धान्तशिरोमणि में बीजगणित
भास्कराचार्य के बीजगणित में (१) अवर्गाङ्क अङ्कों का मूल ज्ञात करने के नियम, (२) कुट्टक गणित की अनेक विशेषताएँ, (३ वर्ग प्रकृति गणित में याग अन्तर की भावनाओं से कनिष्ठज्येष्ठ के ज्ञान के अनेक नियम, (४) एक वर्णसमीकरण के पञ्चकशत- दत्तधनात् इत्यादि के उदाहरण में कल्पना लाघव से व्यक्त मान ज्ञात करने की युक्तियाँ, (५) त्रिभिः पारावता पञ्च इत्यादि उदाहरण में क्रिया लाघव से कपोतादि मान ज्ञात करने की विधि, (६) की राशो वद पञ्चषट् क विहतात्रित्यादि उदाहरण में क्रिया संकोच का कल्पना कौशल, (७) वर्ग समीकरण में विविध मान प्रदर्शन के सिद्धान्त का प्रतिपादन,