सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरात भर गूंजते हुए एक भ्रमर के साथ बाहर को एक भ्रमरी पुष्प के भीतरी भ्रमर से युद्ध सा ही करती रही । सूर्योदय के समय भीतरी भ्रमर पुष्प से बाहर होने पर दोनों का संगम हो सका तो भ्रमर संख्या क्या थी ? यहाँ पर मूल गुणक = १/२, भाग = ८/९, दृश्य = १ । प्रथम प्रकार की क्रिया १ - ८/९ = १/९, १ ÷ १/९ = ९ = नूतन दृश्य १/२ ÷ १/९ = ९/२ = नूतन मूल गुणक, अतः गुणार्ध = ९/४ । (९/४)² + ९ = ८१/१६ + ९ = २२५/१६ का मूल = १५/४ अतः १५/४ + ९/४ = २४/४ = ६ का वर्ग = ३६ यह राशि का आधा होता है । अतः यदि राशि / २ = ३६ तो राशि = ७२ सिद्ध होती है । १०—त्रैराशिक गणित में भी आचार्य का परिष्कार कैसा व्यावहारिक है, यह देखने योग्य है— यदि सोलह वर्ष की स्त्री अपेक्षित काल में ३२/ प्राप्त करती है तो २० वर्ष की स्त्री कितना द्रव्य प्राप्त करेगी ? यद्यपि त्रैराशिक के साधारण नियम के