भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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मध्यगतिवासना १२९ माह—एवमिति । एवमुक्तेनानेनावगतयुक्त्या । खरांशोः सूर्यस्य तत्संख्या सावनदिनसंख्या । अब्दे सौरवर्षे भ्रमतः सौरवर्षसंबन्धिभदिनसंख्यातो निरेका । एकोना भवतीत्यर्थः । तथा च पूर्वस्य यदि पूर्वगत्यभावोऽभविष्यत्तदा नक्षत्रसूर्ययोः प्रत्यहं युगपदुदयसंभवाद्यावन्तो भदिवसास्तावन्त एवाभीष्टकाले सूर्यसावनदिवसाः स्युरिति तत्पूर्वगतिसद्भावादवलम्बनेन युगपदुदयासंभवात्पूर्वगत्या चक्रभोगकाले यावन्तो भदिवसास्तावन्त एकोनाः सूर्यसावन- दिवसाः, चक्रान्तरेणैकभ्रमस्याजायमानत्वादतः पूर्वगत्या चक्रभोगकालस्य सौरवर्षोक्त्योक्तं सम्यगेव । एवं खरांशोरब्द, इत्यनयोः क्रमेण ग्रहचक्रभोगकाले मध्यमगतितुल्यासुभ्यः स्पष्टगत्यसूनां ह्रासवृद्ध्योस्तुल्यत्वाच्चक्रभोगकाले मध्याः स्पष्टाश्च सावनदिवसास्तुल्या इत्यवधेयम् ॥७॥ केदारदत्त :—कल्पना कीजिए कि किसी दिन सूर्य बिम्ब के साथ किसी नक्षत्र का उदय एक साथ हुआ, ६० घटी = २४ घण्टे के अनन्तर दूसरे दिन उक्त नक्षत्र को पूर्व क्षितिज में उदय देखा गया किन्तु सूर्य का उदय नहीं हुआ, थोड़ी देर के बाद पुनः सूर्य का उदय भी हो गया । रविनिष्ठ राशि के उदयमान से गुणित और १८०० से विभक्त, लब्ध फल तुल्य काल को ६० घटी में जोड़ देने से जितना समय होगा उतने समय में पूर्व क्षितिज में नक्षत्र के उदय के बाद रवि का उदय होता है । उक्त समय की ही रवि की एक सावन दिन संज्ञा होती है । इसी प्रकार प्राग्गतिक गमनशील सभी ग्रहों का सावन दिन होता है, यह बात ध्यान में रखनी चाहिए । ग्रहों की एक दिन की स्थिर गति मान कर उक्त भाँति से ग्रहों के सावन दिन माने गये हैं । वस्तुतः ग्रह गतियों की सूक्ष्म गतियाँ जो क्षण-क्षण में वर्द्धमान या लघीयसी भी होती हैं, तात्कालिक ग्रह गति को प्रमाण मानकर ग्रहों की स्पष्ट गति वश, उक्त मध्यम सावन दिन को स्पष्ट सावन दिन बनाना चाहिए । अतः सावन दिन गतिवशेन प्रतिक्षण में सावन समय चलायमान होता है। क्योंकि नक्षत्र दिन का स्थिर मान मात्र ६० घटी है ग्रह मध्यम गति से उक्त भांति प्राप्त काल को ६० घटी में जोड़ने से जो लब्ध होता है वही काल ग्रह का मध्यम सावन दिन होता है । इस प्रकार एक वर्ष में नक्षत्रों की उदय संख्या में एक कम कर देने से प्राप्त फल के तुल्य ग्रहों की सावन दिन संख्या होती है । उपपत्ति :—चूँकि सूर्य का पूर्व गति से भ्रमण क्रान्तिवृत्त में होता है । एक राशि में कला १ × ३० × ६० = १८०० कला होती हैं । त्रैराशिक गणित के अनुपात से यदि रविनिष्ठ राशि की १८०० कला में रविनिष्ठ राशि का उदय मान (कलात्मक) मिलता है तो रविकी १ दिन सम्बन्धिनी स्पष्ट गति कला में कितना काल होगा ? तदर्थ निम्न भाँति के गणित को समझिये—कल्पना कीजिये काल = का, तो ९