सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
पृष्ठ 239, कुल 723 में से
संदर्भ में पढ़ेंमध्यगतिवासना १३७ तद्दशांशालब्धावमानां सावनचन्द्रत्वानुरोधात् । तथा सावनचान्द्रोक्तसंज्ञाव्यञ्जकमित्यर्थः । अवमशेषस्यावमावयवत्वादधिमासादिवृद्धिरूपस्य प्रतिबन्धकत्वाभावाच्चावयवानामवयविजा- तीयत्वं युक्तमेवान्यथा तदवयवत्वानुपपत्तेरिति भावः ॥१४॥ केदारदत्तः—सौर मान से साधित अधिमास का मान चान्द्र मान में, और चान्द्र मान से साधित अधिमास का मान सौर मान में होता है । तथा लब्ध अधिमास में जो अधिशेष होता है वह भी सौर साधित चान्द्र एवं चान्द्र साधित सौर मानात्मक होता है । तथैव, चान्द्रमान एवं सौर मान से साधित अवम और अवम शेष भी क्रमशः सावन और चान्द्रमानात्मक होते हैं ॥१३।१४॥ उपपत्ति—अहर्गण साधन के समय कल्प कुदिन में कल्पाधिमास तो इष्ट कुदिन में इष्टाधिमासादि होते हैं । कल्पाधिमास × इष्टकुदिन अधिशे ----------------------- = इष्टाधिमा + --------- कल्पकु दिन क-कु = अ कल्प सौरमास × इ० चा० अधिशे एवम्, ------------------------ = इ० अ० मा + -------- = क काल्प चान्द्र में क० चा० यहाँ पर "अ" समीकरण में अ का मान चान्द्रात्मक है क्योंकि पूर्व में भी चान्द्र मास संख्या अधिक है जो चान्द्रात्मक होती है बता दिया है । तथा "क" समीकरण में चान्द्र से साधित अधिमास का मान भी सौरमासात्मक मान सिद्ध होता है । कल्प सावन × इष्टचान्द्र सावन शेष तथा, ------------------------- = इष्ट सावन + ----------- = प कल्प चान्द्र कल्प चान्द्र कल्प अवम × इष्ट सावन सावन शेष अन्यच्च—----------------------- इष्ट सा० + ----------- = ब कल्प सावन कल्प सावन यहाँ पर उभयतः साधित अवम का सावन चान्द्र में "प" = सावन मान में, ब = चान्द्र मान में होता है ॥१३।१४॥ (इस सम्बन्ध में ग्रहगणिताध्याय का मध्यमाधिकार ग्रहानयनाधिकार श्लोक १ की केदारदत्त शिखा देखिये) इदानी विशेषः प्रश्नाध्याये— अहर्गणस्याऽऽनयनेऽर्कमासाश्चैत्रादिचान्द्रैर्गणकान्विताः किम् । कुतोऽधिमासावमशेषके च त्यक्ते यतः सावयवोऽनुपातः ॥१५॥