सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यगतिवासना १४१ अमान्त से अमान्त तक चान्द्र मास, एवं संक्रान्ति से संक्रान्ति तक सौर मास होता है । अमान्त के आगे संक्रान्ति तक के समय का नाम अधिशेष है । अमान्त से इष्ट तिथि तक सौर दिन तुल्य चान्द्र तिथियों को या अहर्गण साधन में जोड़ा गया है यहाँ पर अधिक शेष तुल्य संख्या का सुविधा के लिये अधिक जोड़ा हो गया अतः आगे की गणित क्रिया में इसका उपयोग नहीं होता है । इसी प्रकार तिथि के अन्त से सूर्योदय तक अवम धनात्मक अवम शेष संज्ञक काल का भी यहाँ पर त्याग किया गया है । उपपत्ति— मध्यम मान से प्रत्येक अमावास्याओं के अन्त में चान्द्र मास की पूर्ति होती है, तदनुसार कल्प या युग के चान्द्र मासों की संख्या निर्दिष्ट की गई है । तथा मध्यम मान से सूर्य की जितनी संक्रान्तियाँ होती हैं उनकी संख्याओं का भी उल्लेख हो चुका है । चूँकि चान्द्रमास संख्या—सौरमास संख्या = अधिमास संख्या । इसलिये सौर मास और चान्द्रमास के बीच में जितनी भी सावयव तिथियाँ हैं उनकी अधिमास शेष संज्ञा और वह संख्यात्मक होती है । १२ × सौर वर्ष = चैत्रादि (शुक्ल प्रतिपद) समय तक की सौर वर्षीय संख्या को ३० से गुणा करने पर सौर दिन संख्या चैत्रादि तक समीचीन होती है । तदुपरि इष्ट समय के अहर्गण साधन में सौर दिन की जगह सौर दिन तुल्य चैत्रादि चान्द्र दिन (तिथि) जोड़े गए हैं, जोड़ना चाहिए सौर दिन । अतः यहाँ पर इसलिये सौर चन्द्र के अन्तर तुल्य अधिक मान ग्रहण किया गया है । अतएव ऐसी स्थिति में यहाँ पर अधिक शेष दिन तुल्य मान को उक्त इष्ट सौर मास में और कम करना चाहिए इसीलिये अनुपात से प्राप्त अधिक मास और शेष को सौर दिनों में जोड़ देने से इष्ट समय तक की चान्द्रतिथियाँ हो जाती हैं । एक जगह (अ० शे० / क० सौ०) मान जोड़ दिया गया है अतएव वहाँ पर अब अधिशेष जोड़ने की आवश्यकता गणित से प्राप्त नहीं है तस्मात् (अ० शे० / क० सा०) मान का त्याग हुआ है । अवमशेष अर्थात् अनुपात से प्राप्त इष्टचान्द्र + (इष्टचान्द्र / कल्प चां) सावयव फल (इ० चां० / क० चां०) का त्याग क्यों ? प्रत्येक तिथ्यन्त के अनन्तर जितने समय में सूर्योदय होता है उतने समय तक की इस काल की संज्ञा अवमशेष घटिका होती है । चान्द्र दिन–सावन दिन = अवमदि यदि अयमशेष का त्याग न कर लब्ध अवमशेष घटिकाओं को तिथियों में कम करते हैं तो यह अहर्गण सम्बन्धित तिथि के अन्त समय