सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० गोलाध्याये मध्यमाधिकारोक्तं मुख्यपदार्थानां निर्णयः कृतः । तदुत्तरं च स्पष्टज्ञानोपजीव्यं स्पष्टीकरण- वासनायां वक्तुमुचितमिति भावः ॥ दैवज्ञवर्यगणसंततसेव्यपार्श्वश्रीमद्रङ्गनाथगणकात्मजनिर्मितेऽस्मिन् । यातः शिरोमणिमरीच्यभिधे समाप्तिं मध्याधिकारगदितार्थसुवासनोऽयम् ॥ इति श्रीसकलसार्वभौमरङ्गनाथगणकात्मजविश्वरूपापरनामकमुनीश्वर- गणकविरचिते सिद्धान्तशिरोमणिमरीचावुत्तराध्याये मध्यमगति- वासनाध्यायः ॥ केदारदत्तः—अपने भू-पृष्ठीय स्थान विशेष बिन्दु पर, भूपरिधिज्ञान— अपने स्थान और मेरु नाम ध्रुव स्थान के अन्तर योजन लम्बांश मान से ध्रुव स्थान से समान अन्तरित वृत्त की परिधि अपने देश की स्फुट भूपरिधि होती है । ध्रुव से स्वदेशीय याम्योत्तर में निरक्ष खमध्य तक त्रिज्या होने से पूर्व में पठित भूपरिधियोजन में त्रिज्या से भाग देकर लम्बज्या से गुणा करने से अपने देश की भूपरिधि होती है । उपपत्तिः—ध्रुवद्वय और अपने खमध्यद्वय गत याम्योत्तर वृत्त का नाडी वृत्त से जो सम्पात होता है उस सम्पात का नाम निरक्ष खमध्य होता है । निरक्ष खमध्य से अपने खमध्य तक याम्योत्तर वृत्त में अक्षांश चाप की ज्या का नाम अक्षज्या है । अक्षांश को ९० में घटाने से ध्रुव से अपने खमध्य तक लम्बांश की ज्या का नाम लम्ब-ज्या है और ध्रुव से निरक्ष खमध्य तक ९० अंश की ज्या का नाम त्रिज्या है । उ. ध्रु. अपना खमध्य पश्चिम पूर्व निरक्ष देशीय परिधि निरक्ष मध्य द. ध्रु. अतः अनुपात से—(क्षेत्र देखिये) ध्रु० पू० ध्रु० प० = ध्रुव का याम्योत्तर वृत्त । ध्रु० ख, नि० ध्रु० = अपने देश में याम्योत्तर वृत्त ।