भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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( २० ) भगण शेष में इष्ट ग्रह भगण + ──────── अतः भगण शेष को १२ से गुणा करने पर भ० शे० कल्प कुदिन भगण शेष × १२ गतराशि + भगण शेष ────────── = ───────────────── इसी प्रकार आगे विकलादि शेष ज्ञात कर क० कु० क० कु० गुणक और लब्धि के ज्ञान से विलोम क्रिया से विकलादि शेषादि समझकर कल्प कुदिन का ज्ञान सुलभ हो जाता है। इसलिए मात्र दिग्दर्शनार्थ संक्षेप से यहाँ पर इस गणित का उल्लेख किया गया है। वर्ग प्रकृति जिस गणित की प्रकृति ही वर्गात्मक होती है उसे वर्ग प्रकृति गणित कहा गया है । जैसे, उदाहरण—वह कौन सा वर्गांक है जिसको ८ से गुणाकर उसमें १ जोड़ दें तो वह अंक वर्गांक ही रहता है अर्थात् सदा उसका मूल मिल ही जाता है। आचार्य यहाँ पर गुणक ८ का नामकरण प्रकृति करते हुए जोड़े या घटाये जाने वाले पदार्थ का नाम क्षेपक देते हैं। जैसे, इस प्रश्न में प्रकृति = ८ क्षेपक = १ इसका हल निम्न- भाँति से है। इष्ट अंक कल्पनाकर उसको प्रकृति से गुणा करने पर गुणन फल में जितना जोड़ने से मूल मिलता है उसे क्षेप संज्ञा देकर इष्ट का नाम कनिष्ठ, प्रकृति × इष्ट वर्ग + क्षेप का नाम ज्येष्ठ और मूल प्राप्त्यर्थ युक्त अंक का नाम क्षेप कहा गया है। जैसे—यहाँ पर इष्ट का मान यदि १ तो १ का वर्ग = १ इसे प्रकृति से ८ से गुणा करने पर १ × ८ = ८ इसमें फिर हाल १ जोड़ने पर ९, और ९ का मूल = ३ यह ज्येष्ठ होता है। इसी प्रकार दूसरी पंक्ति में दोनों क्षेप, ज्येष्ठ और कनिष्ठ उत्पन्न होने से दोनों में परस्पर भावना एक दूसरे का घनिष्ठतम संबन्ध से इष्ट = १ = ज्येष्ठ = ३ क्षेप = १, कनिष्ठ = इष्ट - १ ज्येष्ठ = ३, क्षेप = १ । ऐसी स्थिति में वज्राभ्यास का तात्पर्य × गुणा अर्थात् कनिष्ठ × ज्येष्ठ + ज्येष्ठ × कनिष्ठ = कनिष्ठ, तथा (कनिष्ठ × कनिष्ठ) × प्रकृति + ज्येष्ठ × ज्येष्ठ = ज्येष्ठ मूल और दोनों क्षेपों का गुणनफल क्षेप × क्षेप = तृतीय क्षेप होता है । इस प्रकार कनिष्ठ ज्येष्ठ और क्षेप अनेक नवीन उत्पन्न होते हैं। यथा क ×