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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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( २१ ) और १ × १ = १ = क्षेप की उपलब्धि होती है। पुनः नूतन उत्पन्न क० = ३५ ज्ये० = ९९, क्षे० = १ आलाप मिलाने से ३५ का वर्ग = १२२५, इसे ८ से गुणा करने पर १२२५ होता है। इसको प्रकृति = ८ से गुणा करने पर १२२५ × ८ = ९८०० होता है। इसमें क्षेप = १ जोड़ने से ९८०१ होता है, ९८०१ का मूल निकालने से ९९ ┌────── │ ९८०१ │ ८१ ─────── १८९ │ १७०१ मूल = ९९ │ १७०१ ज्येष्ठमान स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार एक ही नहीं अनेक अनन्त अंक पदों से प्रश्न का समीचीन उत्तर होता है। यह है आचार्य की सूक्ष्म बुद्धि का महान् अंकगणित कौशल का आविष्कार। वर्ग प्रकृति और कुट्टक से सम्बन्धित चक्रवाल गणित चक्र की तरह परिभ्रमणशील होने से इस गणित का कुट्टक और वर्ग प्रकृति संबंधेन कुट्टक से गुण लब्धि की प्राप्ति के अनन्तर पुनः

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