भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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१८८ गोलाध्याये नानाविधा। नैकरूपेत्यर्थः। तथा च प्रतिमण्डलादिकं फलोत्पादनार्थं बुद्धिकृतानुकाशवि- भागेन कल्पितं तथोक्तमन्दपरिधयोऽप्यार्षग्रन्थे कर्णानुपातानुक्तिदर्शनात्त्रिज्यावृत्ते मध्यम- कक्षावृत्ते कल्पिता उक्तशीघ्रपरिधयः कर्णानुपातानुक्तिदर्शनात्परमशरकलावतकर्णाग्रे कल्पिता इति शङ्कानवकाशः । आरोपे सति निमित्तानुसरणं नतु निमित्तमस्तीत्यारोप इति भावः । केचिदित्यस्वरसबीजं तु कक्षास्थमध्यग्रहचिह्नान्मन्दपरिधिवृत्तस्य समुल्लिखनात्तस्य कर्ण- व्यासार्धवृत्तपरिध्यनुसृतपरिधित्वकल्पने मानाभावो वैयधिकरण्यं च । आगमश्चेत्कर्णानुपा- वानुक्तावेव लाघवात्कल्प्यतामिति । कल्पकास्तु मन्दकर्णसूत्रसक्तकक्षामण्डलप्रदेशे शीघ्रनी- चोच्चवृत्तमध्ये मन्दस्फुटस्थानं न किंतु शीघ्रनीचोच्चवृत्तस्थं यावनमते । मन्दप्रतिवृत्तस्थत्वा- न्मन्दप्रतिवृत्तकेन्द्रसमसूत्रेण मन्दप्रतिवृत्तग्रहचिह्नाभिमुखेन कक्षावृत्ते यत्र संपातस्तत्र शीघ्र- नीचोच्चमध्यं मन्दस्फुटस्थानं हिन्दुकमते । एवं च कक्षावृत्ते मध्यमन्दस्फुटयोरन्तरं मन्दफलं तज्ज्यामन्दनीचोच्चवृत्तस्योच्चरेखा ग्रहान्तरतुल्यरेखाम्रूपभुजफलतुल्येति मन्दकर्णानुपाता- प्रसक्तिः शीघ्रकर्णसमसूत्रेण कक्षावृत्ते स्फुटभोगाङ्गीकाराच्छीघ्रकर्मणि शीघ्रकर्णानुपात इत्याहुस्तच्चिन्त्यम् । कर्णसमसूत्रेण ग्रहबिम्बदर्शनात्तत्समसूत्रसक्तकक्षाप्रदेशे स्पष्टग्रह- भोगाङ्गीकारेण सूर्यचन्द्रयोर्मन्दकर्णानुपातं विना स्पष्टीकरणानुपपत्तेः । न च सूर्यचन्द्र- योर्मन्दप्रतिवृत्तस्थयोर्यत्सूत्रं मन्दप्रतिवृत्तमध्याभिमुखं यत्र कक्षावृत्ते लगति तत्र स्पष्टत्वं न कर्णसूत्रेणेति वाच्यम् । भौमादीनामपि शीघ्रप्रतिवृत्तकेन्द्राच्छीघ्रप्रतिवृत्तस्थग्रहबिम्बपर्यन्तं सूत्रं कक्षावृत्ते यत्र लग्नं तत्र स्पष्टो ग्रहभोग इति विनेगमकाभावादङ्गीकाराच्छीघ्रकर्मणि कर्णानुपातानुपपत्तेः । उक्तयुक्तस्तुल्यत्वात् । अथ सूर्यचन्द्रयोः स्वल्पान्तरत्वात्कर्णानुपा- तत्त्याग इति चेद्भौमादिष्वपि तस्य परिहारत्वसंभवेन मन्दस्फुटस्फुटयोर्भिन्नरीत्या स्वरूप- कल्पने गौरवात्प्रमाणाभावाच्च ।।३६।।३७।। केदारदत्तः—मन्द फल एवं शीघ्र फल एवं दोनों फलों का गणित साधन मन्द कर्ण ओर शीघ्र कर्ण से अनुपात द्वारा साधन करना उचित है । शीघ्र फलानयन में कर्णानुपात किया गया है जो उचित है किन्तु मन्दकर्ण में कर्णा- नुपात्त नहीं किया गया है । मन्दकर्ण से भी अनुपात द्वारा फल साधन करना चाहिए किन्तु अत्यन्त अल्पअन्तर (अकृत कर्णानुपात से) होने से मन्दकर्म में कर्णानुपात त्यक्त किया गया है क्योंकि कर्णानुपात करने से जो फल मिलता है वह पूर्व साधित फल के आसन्न होता है, यहाँ पर स्वल्पान्तरत्वात् कर्णानुपात त्याज्य हुआ है । जो शीघ्रफल में भी शीघ्र कर्णानुपात अनावश्यक था ऐसा कहा जाय तो यह कथन उचित नहीं होने से यहाँ त्याज्य नहीं कर सकते क्योंकि फल साधन के गणित में अन्तर पड़ता है । उपपत्ति—मन्द कर्म में मन्द कर्णानुपात व्यासार्ध से जो वृत्त रचना हुई है उस वृत्त का नाम कक्षा मण्डल होने से उसी वृत्त में ग्रह चलता है— पाठ पठित परिधि को त्रिज्या परिणत किया गया है अतः अनुपात से—

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या) · पृष्ठ 290, कुल 723 में से · BharatKosha