सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछेद्यकाधिकारः १९१ त्तस्पष्टस्यात्रोपयोगाभावाच्चेति चेन्न । भूपृष्ठे भगोलस्य मध्यत्वाभावेन तच्चारभोगदर्श- नस्य फलादेशानुपजीव्यत्वात् । भूगर्भे तन्मध्यत्वेन तच्चारभोगदर्शनस्याऽऽवश्यकत्वाच्च न तत्संस्काराद्ग्रह इति सूर्याद्यार्षामिप्रायात् । कथमन्यथा तैः सूर्यग्रहणे लम्बनादिदृग्गोचरार्थं ग्रहसंस्करणरूपमुक्तम् । एतदुक्त्यैव तेषां भूगर्भपृष्ठभेदज्ञानावश्यंभानेव ग्रहफलत्वेनैत्फल- स्योक्तौ लम्बनादिसाधनं व्यर्थम् । चन्द्रग्रहणेऽपि तदापत्तेश्च । तस्मात्स्वभूपृष्ठसमसूत्र- संबन्धेनेन भूगर्भीयस्पष्टग्रह एव भूपृष्ठे स्पष्टग्रहः । अन्यथा भूपृष्ठानामनन्तत्वादेककालेऽनेक- ग्रहमोगापत्त्या तन्नक्षत्रादिचारेण देशजफलस्याऽनिश्चयापत्तेः । अत एव सर्वग्रहगणितजातं भूगर्भ एवाङ्गीकृतं न भूपृष्ठे । अन्यथाऽक्षांशचरादिकान्यपि तत्र भिन्नान्युक्तानि स्युः । दृक्प्रत्ययार्थं च भूपृष्ठे लम्बनादिकं साध्यम् । कथमन्मथाऽस्मादृशां सूर्यग्रहणप्रत्यय इत्यादि । एतेन नतमिति खचरविशेषणं कृत्वा नोकारस्य भूपृष्ठग इत्यत्रान्वयान्नतकर्म पूर्वमुक्तमिति तत्स्वरूपप्रतिपादनपरो ऽयं श्लोक इति मत्वा परस्परविरुद्धार्थकत्वान्नायं मूलकृतकृतः । नत- मित्यस्य वैयर्थ्यात् । उक्तोपपत्त्या नतकर्मणोऽनुक्तत्वाच्चेत्यादि परास्तम् ।। ३८।। केदारदत्तः—ग्रहों में नत संस्कार लम्बनादि बताया जा रहा है। अपने खमध्य से पूर्व या पश्चिम कपालगत ग्रह को अपने प्रतिमण्डल में भूगर्भ दृष्टि से द्रष्टा जिस स्थल पर ग्रह को देखता है उस स्थल पर भूपृष्ठीय द्रष्टा की दृष्टि में नत होने से वहाँ पर वह ग्रह नहीं होता है कुछ आगे या पीछे दृष्टि में आता है । तथा मध्याह्न समय में गर्भ और पृष्ठ सूत्र की एकता होने से दोनों (गर्भ पृष्ठ) दृष्टियों से एक ही स्थल पर ग्रह दर्शन होने से यहाँ नतकर्म प्राप्त नहीं होता हैं। अतः ग्रहों में नतकर्म संस्कार भी आवश्यक है जो सूर्य ग्रहण में लम्बन संस्कार की तरह यह संस्कार किया जाना चाहिए । उपपत्तिः—सारा ग्रहगणित भूगर्भ केन्द्राभि प्रायिक होने से आकाशस्थ ग्रह स्थान भूगर्भ दृष्टि से सम्यक् ठीक होते हैं। किन्तु भूगर्भ से कोई आकाश देखेगा ? सम्भव नहीं है तो भी अनन्त ब्रह्माण्ड के किसी बिन्दु से जब पृथ्वी ही बिन्दु मात्र हैं तब तो पृथ्वी के गर्भ पृष्ठ की कल्पना भी व्यर्थ होती है। यहाँ पर पृथ्वी से दृश्य सौर मण्डलस्थ ग्रहों के स्थान दृश्यादृश्य का गणित किया जा रहा है जो भूगर्भ केन्द्र से सुसाध्य होता है । अतः द्रष्टा पृष्ठ स्थानीय होता है अतः भूपृष्ठ से ग्रहों को देखा जाता है, भूगर्भ केन्द्र से साधित गणित में गर्भ पृष्ठ भेद जन्य संस्कार लम्बनवत् अपेक्षित है यहाँ पर जिसे नत संस्कार कहा गया है वह खमध्य से पूर्वापर कपालभेद से दृश्य योग्य होने के लिये नत कर्म आवश्यक होता है ।।३८।। इदानीं गतिफलाभावस्थानमाह— कक्षामध्यगतिर्यग्गेऽथाप्रतिवृत्तसंपाते । मध्यैव गतिः स्पष्टा परं फलं तस्य खेटस्य ॥ ३९ ॥