भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 723 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 292

युतमित्यस्योपपत्त्या सिद्धत्वाद्विधुः प्रागृणे फले युक्त Wait, look at "सिद्धत्वाद्विधुः" or "सिद्धत्वाद्बिधुः"? It's 'सिद्धत्वाद्विधुः' or 'सिद्धत्वाद्बिधुः' (both occur, typically विधुः/बिधुः). Look at 'प्रागृणे': 'प्रा' + 'गृ' (or 'गॄ' or 'ग्ऋ')? Look at: 'प्रा' then 'गृ' with ृ: 'प्रागृणे' (prāg-ṛṇe written as prāgṛṇe).

Line 20: इतोऽन्यथोन इत्यस्यासंगतत्वापत्तिश्च । ननु लम्बनरोक्तरीत्यैव स्पष्टग्रहभोगज्ञानार्थं सूत्रा- Wait: "लम्बनरोक्तरीत्यैव" or "लम्बनोक्तरीत्यैव"? Look at line 20: "ल म्ब नो क्त री त्यै व" -> "लम्बनोक्तरीत्यैव"! There is no 'र'. Wait, what about line 28: "अथवा नतलिप्तिकाग्रहे स्वमृणं खलु लम्बनरोक्तवत् ।" Wait, in line 28: "लम्बनरोक्तवत्" or "लम्बनोक्तवत्"? Line

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या) · पृष्ठ 292, कुल 723 में से · BharatKosha