भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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छेद्यकाधिकारः १९७ केदारदत्तः—कुश के अग्रभाग की तरह तीक्ष्ण बुद्धि के गणकों ग्रहगणितज्ञों के लिये यह छेद्यकाधिकार अत्यन्त परमाणु रूप का है अर्थात् अधिकार का सारा सारभूत विषय आसानी से उनकी बुद्धिगत हो जाता है। और जो गणक विषय को नहीं समझते कुण्ठित बुद्धि के हैं उनके लिये यह छेद्यकाधिकार इन्द्र के वज्र से आहत पक्ष की तरह (पर्वतों के दो पंखे दो हाथ थे जो इन्द्र के वज्र से खण्डित होने से पर्वत अपनी जगह स्थिर हो गये अचल हो गये ।—पुराणकथा) है अर्थात् इस अधिकार को समझने के लिये उनकी बुद्धि कुण्ठित हो जाने से वे ग्रहगोलज्ञान सागर तक नहीं पहुँच पाते हैं ।।४४।। इति सिद्धान्तशिरोमणि ग्रहगोलाध्याय के छेद्यकाधिकार :—५ की श्री पंडित हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत सोपपत्तिक “केदारदत्तः” हिन्दी व्याख्यान सम्पन्न ।