सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ गोलाध्याये त्वात् । हराधिक्येन फलन्यूनत्वसंभवात् । यथोक्तप्रकारेण षड्भागज्यासिद्धावपि परिध्यर्ध- चापस्य व्यासभितसिद्धज्याया असिद्धिः । तथा हि—अत्र प्रथमस्य परिधिवर्गचतुर्थांशरूप- त्वात्परिधिवर्गहरेण हरो नवांशाधिकः कृतः । यथा परिधिवर्गः स्वपादयुक्तो जातः पञ्चा- हतः परिधिवर्गचतुर्थभागः पव ५/४ । अयं परिधिषड्भागजनितप्रथमेनानेन पव ५/३६ समच्छेद- तया हीनो जातः परिधिवर्गश्चत्वारिंशद्गुणितः षट्त्रिंशद्भक्तस्तत्र गुणहरौ चतुर्भिरपवर्तितौ जातौ परिधिवर्गस्य गुणहरो दशनवमितौ । तेनोक्तप्रकारेण नवांशाधिकः कृतः । परिध्यर्ध- चापे तु प्रथमस्य परिधिवर्गचतुर्थांशरूपत्वात्तदूने पञ्चाहते परिधिवर्गचतुर्थभागे परिधिवर्ग- तुल्यत्वान्न हराधिक्यमित्युक्तप्रकारेण षड्भागपरिध्यर्धयोः सूक्ष्मज्यासिद्धिरितदितरज्यास्तु स्वसंबन्धिहराभावाल्लाघवाद्वैतीयवगतहरग्रहणेने साधिताः स्थूला एव भवन्ति । स्वस्वह- राणामनुगतैकप्रकाराभावात् । पृथक्पृथक् तद्दानयनकथने च गौरवादिति पाट्योक्तज्या- साधनस्य स्थूलत्वं स्फुटमेवेत्यलं पल्लवितेन ॥२१॥२२॥२३॥२४॥२५॥ अथ प्रतिज्ञाता ज्योत्पत्तिर्निरूपितेत्युपसंहारं ज्याविचाराणां कांक्षासिद्ध्यर्थं फक्कि- कायाऽऽह—इति ज्योत्पत्तिरिति ! स्पष्टम् ॥ केदारदत्तः—इस गोलाध्याय ग्रन्थ के मध्यगति वासना अधिकार के अनन्तर छेद्यकाधिकार के श्लोक ६ तक ज्या चाप विषयक जीवा क्षेत्र संस्थान के ६ श्लोकों में, किसी वृत्त के चतुर्थांश ३६०/४ = ९० अंशों के चाप के १....१५....३०....४५.... ६०....७५....९० के चाप अंशों का चापीय मानों का सरल रेखात्मक मान ज्ञात किया गया है । किसी वृत्त के केन्द्रगत वृत्त परिधि तक जाने वाली पूरी रेखा का नाम व्यास और अर्द्धव्यास का नाम त्रिज्या अर्थात् तीन राशियों की ज्या कहा गया है । भूगर्भ केन्द्राभिप्रायिक इञ्च, फीट, गज, मील (किलोमीटर) आदि से लेकर अनन्त दूरी तक के वृत्तों में इष्ट वृत्त दूरी की कल्पित दूरी के अभीष्ट वृत्त की व्यासार्ध रेखा का प्रसिद्ध रेखाकार नाम त्रिज्या होता है और यह त्रिज्या अभीष्ट वृत्त की चतुर्थांश चाप की ज्या कही जाती है । यदि वृत्त का परमाधिक चाप ९० अंश है तो ९० × ६० = ५४०० कला इस चाप की रेखाकार परम ज्या त्रिज्या का मान = ३४३८ कला प्राचीन आचार्यों ने (प्रारम्भ सूर्य सिद्धान्त से सिद्धान्त ज्योतिष काल ने) माना है । आचार्य ने ज्या चाप गणित के इस विषय में अपनी "लीलावती" (अङ्कगणित) नामक पाटी गणित के वृत्तक्षेत्र व्यवहार में सविस्तार बता दिया है । जैसे आचार्य के प्रश्नानुसार उत्तर में आचार्य की बताई गई गणित प्रक्रिया के उदाहरण से— जिस वृत्त का व्यास मान, (हाथों, मीलों, किलोमीटर....आदि) ७ है उस व्यास की परिधि क्या होगी ?