सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्योत्पत्तिवासना २२५ व्यासे भनन्दाग्निहते विभक्ते खबाणसूर्यैरित्यादि से— ७ × ३९२७ २७४८९ १२३९ ―――――― = ―――――― = २१ ――――― । यहाँ पर लब्धि पूर्ण २१ और शेष . १२५० १२५० १२५० १२३९ ―――― को स्वल्पान्तर से १ मान लेने पर परिधि मान = २२ होता है। १२५० फलतः ७ व्यास में परिधि = २२ होती है, अतः अनुपात से इष्ट व्यास में २२ × इष्टव्यास २२ १ ――――――― = परिधि होती है। ―― का तात्पर्य ३ ―― भी होता है। ७ ७ ७ २२ आधुनिक गणित से भी सिद्ध दशमलवकीय पद्धति से ―― = ३.१४ ५९२६, ७ ३९२७ जो भास्कराचार्य के सूक्ष्म मान = ―――― इससे भी ३.१४१६••••आधुनिक मान के १२५० आसन्न हो जाता है। फलतः किसी भी वृत की वृत्तपालियों से केन्द्र तक गई रेखा का नाम व्यास और उसका मान जिस माप में जितना हो उसे २२ से गुणा कर ७ से भाग देने से उस वृत्त [चित्र: वृत्त, केन्द्र 'के.', ऊर्ध्व बिन्दु 'अ', अधो बिन्दु 'च', क्षैतिज व्यास 'य ल', अन्य व्यास 'र प', 'ह क'। लम्ब 'क द' (अ-के पर) तथा 'क म' (य-ल पर)] की परिधि का मान स्पष्ट हो जाता है। वृत्त केन्द्र और परिधि के दोनों बिन्दु तक गत रेखा का परम्त्व मान व्यास होता है। जैसे, अ च = कह = लय, = पर = चअ, इत्यादि। यह सभी व्यास रेखा है। इससे बड़ी रेखा वृत्त में हो नहीं सकतीं। यहाँ पर वृत्त व्यास और वृत्त परिधि के गणितीय सम्बन्ध स्पष्ट हैं। किन्तु वृत्त के अनेकों विभागों की चापात्मक वक्र रेखा की जो सरला- कार रेखा होती है उसका मान ज्ञात करना इस प्रकरण का आवश्यक गणित अचार्य ने बताया है। जैसे चाप = अ क इसकी सरलाकार रेखा का नाम क द = अ क चाप की ज्या से, एवं ९० - चाप अ क = चाप क ल भी ज्या का नाम फ़म को कोटिचाप कहा गया १५