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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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पृष्ठ 328

२२६ गोलाध्याये है। अथवा यदि कल चाप है तो कल चाप की ज्या = कम, तथा ९०—क ल = अ क की ज्या = क द यह कोटिज्या होतो है । इस प्रकार १ अंश से ९० अंश तक के चाप की ज्या का गणित मान अंकों में साधित किया गया है। इस प्रकार का ज्या गणित ८ प्रकार का जगह-जगह जहाँ जिसकी आवश्यकता होती है, होता है। जैसे— १. ज्या २. कोटिज्या ३. स्पर्श ज्या ४. कोटिस्पर्श ज्या ५. छेदन ज्या ६. कोटि छेदन रेखा (ज्या) ७. उत्क्रम ज्या या उत्क्रम रेखा और (८) उत्क्रम चाप कोटि चाप की सरल रेखा का नाम कोट्युत्क्रम ज्या होता है । वक्राकार अभीष्ट चाप का सरलाकार रेखा का मान कितना होगा ? और यह साधनिका गणित से क्या आवेगी ? इस प्रकार के प्रश्न और समाधान पर इस ज्योत्पत्ति प्रकरण में आचार्य ने, मूल सही सिद्धान्तों का गणित स्पष्ट कर दिया है । इसी आधार से आधुनिक प्रकाशित एवं विकसित गणित में यह विषय अत्यधिक अधिक सूक्ष्म रीति से गणित संसार में यत्र तत्र सर्वत्र उपलब्ध हैं और ग्रन्थों में जो सरल त्रिकोणमिति एवं चापीय त्रिकोणमिति नाम से प्रसिद्ध हैं तथा सिद्धान्त शिरोमणि गोलाध्याय की प्राचीन उपलब्ध पुस्तकों में इस छेदकाधिकार में ज्योत्पत्ति के मात्र ६ श्लोकों का उल्लेख करते हुये ग्रन्थ समाप्ति के अनन्तर आचार्य ने "ज्योत्पत्ति" नाम का एक स्वतन्त्र प्रकरण पृथक दिया है। अनेक प्राचीन पुस्तकों में भी पूरा ज्योत्पत्ति प्रकरण समाप्ति पर न देकर कुछ आचार्यों ने यहीं पर यह प्रकरण देकर समापन के अनन्तर .... छेदकाधिकार का ७ वाँ श्लोक "भूमेर्मध्ये खलु भवलयस्यापि मध्यं यतः स्यादिति" दिया है। तदनुसार मैंने भी उक्त ज्योत्पत्ति प्रकरण को प्रसङ्गानुसार यहाँ पर ही देना उचित समझ कर प्रकरण प्रसंग का समन्वय उचित समझा है। तथा मरीचि भाष्य पर इस विषय में अत्यन्त अधिक गहन विचार, उपपत्ति, ज्यागणित उपस्थित हुआ है जो तत्काल में आवश्यक था । आज के युग में इस ज्या चाप गणित सम्बन्ध के अनेक स्वतन्त्र ग्रन्थ सरलत्रिकोण- मिति चापीय त्रिकोणमिति नाम से प्रसिद्ध हैं अत एव यहाँ पर ग्रन्थ गौरव भय से इसका श्रम साध्य "केदारदत्तः" व्याख्यान अनावश्यक ही है सुविधा से उपलब्ध ग्रन्थान्तरों में इस व्याख्यान की अपेक्षा सम्बन्धित ग्रन्थों में और अच्छी व्याख्या की समुपलब्धि से विषय के अध्येता वर्ग को क्लेश नहीं अपि च ऐच्छिक सहायता मिलेगी । ●