भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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२४० गोलाध्याये क्षेपवृत्त में भी राश्यादि अङ्कित कर, मेषादि बिन्दु से विलोम क्षेप पातदान बिन्दु पर चिह्न लगाकर, इस बिन्दु पर क्रान्तिवृत्त और क्षेपपात वृत्त अर्थात् विमण्डल वृत्त का सम्पात कर, इस सम्पात बिन्दु से ६ राशि आगे पर क्रान्तिवृत्त विमण्डल का द्वितीय सम्पात करना चाहिए। उक्त सम्पात द्वय बिन्दुओं से तीन राशि की दूरी पर परम शर तुल्य दूरी पर पीछे उत्तर को विमण्डल को स्थिर कर तथा उसी सम्पात से ३ राशि की दूरी पर परमशर तुल्य दूरी पर दक्षिण की तरफ स्थिर बिन्दुगत विमण्डल वृत्त की स्थापना करनी चाहिए । ग्रहों के पाठ पठित शर को त्रिज्या से गुणा कर शीघ्र कर्ण से भाग देने पर ग्रह गोलीय कक्षावृत्त रूप क्रान्ति वृत्तीय शर को त्रिज्या वृत्त में परिणत कर उसे स्फुट शर समझना चाहिए । इस प्रकार त्रिज्यागोल में चन्द्रादि शनि पर्यन्त सभी ग्रहों का इष्ट स्थानीय स्पष्ट शर होता है। सभी ग्रह भूगर्भ से शीघ्र कर्णाग्र दूरी पर अपनी कक्षाओं में भ्रमण करते हैं इसलिये सभी के शर को कर्णानुपात द्वारा अपने त्रिज्यागोल में परिणत करना उपपत्ति सिद्ध होता है ।।१३।१४।१५।। इदानीं क्रान्ति विक्षेपं चाह— नाडिकामण्डलात् तिर्यगत्रापमः क्रान्तिवृत्तावधिः क्रान्तिवृत्ताच्छरः । क्षेपवृत्तावधिस्तिर्यगेवं स्फुटो नाडिकावृत्तखेटान्तरालेऽपमः ॥१६॥ वा० भा०—क्रान्तिवृत्ते यत्स्फुटग्रहस्थानं तस्य नाडीवृत्तात्तिर्यगन्तरं सा क्रान्तिः। अथ विमण्डले च यद् ग्रहस्थानं तस्य क्रान्तिवृत्ताद्यत्तिर्यगन्तरं स विक्षेपः। अथ विमण्डलस्थग्रहस्य नाडावृत्ताद्यत्तिर्यगन्तरं सा स्फुटा क्रान्तिः ।।१६।। मरीचिः—अथ प्रसङ्गात्क्रान्तिशरयोः स्वरूपं सविवृण्वाऽऽह—नाडिकेति । अत्र भगोले नाडिकामण्डलप्रदेशात् । तिर्यग् दक्षिणोत्तरमन्तरमपमः क्रान्तिः । ननु द्वितीयावधेरज्ञानादन्तरज्ञानं कथमित्याह—क्रान्तिवृत्तावधिरिति । नाडिकावृत्तप्रदेशैकदेश- क्रान्तिवृत्तस्थस्पष्टग्रहचिह्नयोरन्तरं ध्रुवप्रोतवृत्तस्थं क्रान्तिरित्यर्थः । शरस्वरूपमाह— क्रान्तिवृत्तादिति । स्पष्टग्रहस्थानसंबन्धिक्रान्तिवृत्तप्रदेशात् तिर्यग्याम्योत्तरमन्तरं शरः । अत्र द्वितीयावधिमाह—क्षेपवृत्तावधिरिति । क्षेपवृत्तस्थस्पष्टग्रहस्थानं क्रान्तिवृत्तस्थस्पष्टग्रह- स्थानयोरन्तरं क्रान्तिवृत्ताम्योत्तररूपं कदम्बप्रोतवृत्तस्थं शर इत्यर्थः । अथ प्रसङ्गात्स्फुट- क्रान्तिस्वरूपमाह—एवमिति । नाडिकावृत्तप्रदेशैकदेशग्रहबिम्बाश्रयशरवृत्तप्रदेशैकदेश-