सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोलबन्धाधिकारः २४१ योन्तरे। एवं तिर्यग्ध्रुवप्रोतवृत्तस्थे स्फुटोऽपमः स्पष्टा क्रान्तिः । ग्रहस्य विक्षेपवृत्ते स्थिरत्वात् । एतेन क्रान्तिसंस्कारयोग्यशरोऽपि ध्रुवाभिमुखत्वेनोक्त इति ध्येयम् ॥१६॥ केदारदत्तः—क्रान्तिवृत्तीय ग्रह स्थान से ध्रुवाभिमुख ध्रुवप्रोत वृत्त में क्रान्ति होती है तथा विमण्डलीय ग्रह से क्रान्तिवृत्तस्थ ग्रह स्थान तक कदम्बाभिमुख ग्रह का शर होता है। तथा विमण्डलस्थ ग्रह से क्रान्तिवृत्ताधि ग्रह की स्पष्ट, क्रान्ति होती है ॥ उपपत्ति—क्षेत्र देखिये । ध्रु = ध्रुव बिन्दु क = कदम्ब तारा स्था = क्रान्तिवृत्त में ग्रह स्थान । विंलम = क्रान्तिवृत्त समानान्तर वृत्त स्थान = ग्रह की स्थानीय क्रान्ति स्था विं = ग्रह का शर कदम्ब प्रोत में । अनुपात से कदम्ब प्रोतीय शर को ध्रुव प्रोतीय शर बनाने से = ल स्था = ध्रुव प्रोतीय शर । स्था न + स्थाल = स्पष्टाक्रान्ति ध्रुव प्रोत में जो ग्रह बिम्ब से नाड़ी वृत्त तक स्पष्टा दीखती है। यहाँ पर शर युक्त स्थानीय क्रान्ति = स्पष्टा क्रां अन्यत्र और स्थानीय क्रां और ध्रुव प्रोतीय शर का योगान्तर स्पष्टा क्रान्ति होती हैं ॥१६॥ इदानीं क्रान्तिपातमाह— विषुवत्क्रान्तिवलययोः संपातः क्रान्तिपातः स्यात् । तद्भगणाः सौरोक्ता व्यस्ता अयुतत्रयं कल्पे ॥१७॥ १६