सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० गोलाध्याये ग्रहे संस्कृतं चेन्मन्दस्पष्टस्तत्र पातो योज्य इति पात एव शीघ्रं फलं व्यस्तं कृत्वा तद्युतः स्पष्टग्रहः कृतः । उभयथाऽविशेषात्सपातमन्दस्पष्टः सिद्धो भवत्यतः स्पष्टपातादस्मात्स्पष्टग्रह- युताच्छरः श्रीपतिना सम्यगुक्तः । अत एव स्पष्टपातज्ञानार्थं मृदूच्चफलमुपान्त्ये तत्प्रतीपं विदध्याच्छशिसुतपाते शैघ्यन्त्यं परेषाम् । स्फुटतरनिजपातात्क्षेपसिद्धिर्ग्रहाणामिति तदग्रे स्पष्टमुक्तम् । अत्र वक्ष्यमाणानुरोधेन प्रतीपमित्यस्य शैघ्यमन्त्यं परेषामित्यत्र समन्वयः । न मृदुफलमुपान्त्यमित्यत्रेति ध्येयमिति भावः । नन्वेवं चन्द्रस्य द्राक्प्रतिवृत्ताभावान्मन्दप्रति- वृत्तेऽधिष्ठानकल्पना तत्र च मध्यग्रहभोगसद्भावाद्गणितागतपातयुत मध्यमचन्द्राच्छर- साधनमथवा व्यस्तमन्दसंस्कृतपातेन युक्तात्स्पष्टचन्द्रात्तत्साधनमुपपन्नम् । कथं गणिता- गतपातयुक्तस्पष्टचन्द्रात्तत्साधनमुक्तम् । न च तत्र स्फुटचन्द्रानुक्तेः केवलचन्द्रपदेन मध्य एवेति वाच्यम् । केवलचन्द्रपदेन स्पष्टस्यैवोपस्थितेरित्थत आह—चन्द्रस्येति । हि यतः । चन्द्रस्य पातः कक्षावलये त्रिज्योत्पन्नकक्षाशरवृत्ताधः संपातेन प्रतिवृत्तसंबद्ध- कर्णव्यासार्धकक्षाशरवृत्तसंपाते । अतः कारणान्मध्यमपातयुक्तान्मध्यग्रहवदागताहर्गणरूपात् सिद्धचन्द्रपातयुक्तात्स्पष्टाच्चन्द्राच्छरः फलबलकल्पनात् । अन्यथा मन्दकर्णानुपातैक्यापत्तेः । अत एव भौमादीनां भगोल एव गणितागतपातकल्पनमपि निरस्तम् । एतत्सविस्तरं ग्रह- च्छायाधिकारे शरसाधनवासनायां सम्यक्प्रपञ्चितम् ॥२२॥ केदारदत्तः—अन्य ग्रहों के शर और उनके सम्पात बताए जा रहे हैं— नाड़ी वृत्त क्रान्तिवृत्त के दो सम्पात बिन्दुओं का नाम मेषादि और तुलादि जो पूर्व में बताया गया है, उसी प्रकार कान्तिवृत्त के साथ जिस जिस ग्रह भ्रमणवृत्ताकार मार्ग का जो जो विमण्डल नामक हैं, प्रत्येक ग्रह के इस विमण्डल वृत्त और क्रान्तिवृत्त के परस्पर के दोनों सम्पातों का नाम उस उस ग्रह के नाम के साथ उस उस ग्रह का पात कहा जाता है । जैसे चन्द्रमा के विमण्डल का क्रान्तिवृत्त के साथ जो दो सम्पात होते हैं उसे चन्द्रपात, एवं अन्य ग्रहों के विमण्डलों का क्रान्तिवृत्त के साथ के सम्पातों का नाम भी भौमपात, बुधपात••••आदि नामों से उच्चारित किया जाता है । अतः पातयुक्त ग्रह के भुजांश से ग्रहों की शर की साधनिका होती है । उपपत्ति—क्रान्ति वृत्त से ग्रह का विमण्डल जितनी दूरी पर होता है वह उस ग्रह का शर होता है । सम्पात से लेकर ३ राशि की दूरी पर ग्रह का वर्धमान वेग में परम शर, पुनः ३ राशि से ६ राशि तक द्वितीय सम्पात में ग्रह के शर का अभाव, ततः ६ से ९ राशि की दूरी पर ग्रह का वर्धमान याम्य शर और ९-१२ राशि तक में अपचीय- मान शर शून्य तुल्य होता है । परशर × सपात इष्टभुजज्या इष्ट स्थानीय शर ज्ञान के लिये ————————————— = इष्ट स्थानीय शर त्रि का ज्ञान हो जाता है । चन्द्रमा के अतिरिक्त अन्य ग्रहों में पातयुक्त मन्दस्पष्ट ग्रह में शर साधन करना