सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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२८८ गोलाध्याये विशेष—अमान्त काल अनेक प्रकार का होता है । सूर्य भ्रमण मार्ग और और चन्द्र भ्रमण मार्ग की एकता अर्थात् चन्द्रशर के अभाव की स्थिति के समय उक्त क्षेत्र सुतरां समीचीन है । किन्तु चन्द्रमा अपने विमण्डल में भ्रमण करता है, चन्द्र बिम्बोपरि कदम्ब सूत्र जहां क्रान्तिवृत्त में लगेगा उस जगह पर सूर्य बिम्ब होने से भूपृष्ठ से चन्द्र सूर्योपरिगत रेखा में दोनों सूर्य चन्द्र बिम्बों की स्थिति स्वल्पान्तर शर के अवसर पर ठीक हो सकती है । चन्द्रमा के शराभाव विशिष्टअमान्त में उक्त क्षेत्र सुतरां सही है । चन्द्रमा की शर सत्ता की स्थिति में तथा भूपृष्ठ क्षितिज एवं चन्द्रपृष्ठ एवं चन्द्रपृष्ठ क्षितिजों में वृत्त की स्थिति वश अन्य अनेक संस्कार विशेषों से उक्त क्षेत्र रचना अन्य प्रकार की होगी । जो यहाँ पर व्याख्यान या क्षेत्र से नहीं दर्शायो जा सकतो है और यह गुरुमुख से ग्रन्थाध्ययन से ही सम्यक् स्पष्ट हो सकती है ॥१३-१४॥ अत्र ब्रह्मदिनोपपत्तिमाह— यदति