भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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त्रिप्रश्नवासना २८७ अमांन्त समय से ६ राशि की दूरी पर पूर्णान्त होने से पूर्णान्त में पितृलोकाभिप्रायिक निशीथ अर्थात् रात्र्यर्ध पितृलोक में होता है । इस प्रकार निश्चित स्थान से ३ राशि ९०° आगे अर्थात् कृष्णपक्ष की साढ़े सतमी को पितृलोकाभिप्रायिक क्षितिज में सूर्योदय होता है और इसी सिद्धान्त से शुक्लपक्ष साढ़े सप्तमी (७ १/२) को पितृलोकाभिप्रायिक चन्द्र पृष्ठ में सूर्यनारायण अस्त होते हैं । अमान्त मध्यान्ह सू. चं पृ चं शुक्लपक्ष पृ. कृष्ण पक्ष ७ १/२ ७ १/२ अस्त भू सू''' गर्भक्षितिज-उदय सू' पूर्णान्त सू'' अर्द्धरात्रि उत्पत्तिः—चित्र देखिये— सूर्य कक्षा में गर्भाभिप्रायिक अमान्त काल में सू = सू = मध्याह्न या अमान्त चन्द्र कक्षा में च = अमान्त पृथ्वी = पृ० भू = भूगर्भ केन्द्र सू भू सू = पृथ्वी में गर्भ क्षितिज । सू सू' = अमान्त के बाद की साढ़े सात तिथियाँ पूर्णान्त = सू'' = अर्द्ध रात्रि । सू''' = पितृलोकाभिप्रायिक सूर्योदय = ७ १/२ कृष्ण पक्ष की ७ १/२ तिथियां=चं०-सू०=९०° दर्शान्त समय में चन्द्र पृष्ठाभिप्रायिक ख मध्य के शिर में सूर्य बिम्ब होने से चन्द्रपृष्ठ में मध्याह्न देखा जाना क्षेत्र दर्शन से स्पष्ट है ।