सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नवासना २९७ तत्सिद्धिरत आह—अन्यसंस्थिततयेति । षट्षडक्षांशावधिर्या गोलस्थितिस्तदतिरिक्ता विलक्षणा गोलस्थितिस्तस्या भावस्तयेत्यर्थः । तथा चोक्तं चरादिसाधनं षट्षडक्षांशावधिदेश- गोलस्थितिसिद्धं न तदधिकाक्षांशावधिदेशगोलस्थितिसिद्धम् । अत उक्तानयनेन तत्र न तत्सिद्धिः । किंतु तद्गोलस्थितिसिद्धतदतिरिक्तप्रकारेणेति भावः । अन्यसंस्थि[त]स्तु लम्बाधिकक्रान्तौ द्युरात्रवृत्तानि तत्र क्षितिजं न स्पृशन्त्येवेति तत्रोन्मण्डलक्षितिजान्तराले द्युरात्रवृत्तैकदेशाभावादुक्तस्वरूपचरासिद्धिरतस्तत्संबद्धाग्रादिकस्याप्यसिद्धिरिति । ननु तर्हि तद्गोलस्थितिसिद्धप्रकाराः कथं नोक्ताः । अन्यथा तत्र तज्ज्ञानं कथं स्यादत आह—नेति । तत्र चरादिसाधनं पूर्वैर्नोदितं नोक्तम् । सूर्यसिद्धान्तादौ तद्गोलस्थितिसिद्धप्रकाराणाम- दर्शनादिति भावः । तैः कुतो नोक्तमत आह--येनेति । येन कारणेन । एष षट्षडधि- काक्षांशसंबन्धी विषयो देशो नृगोचरो मनुष्यसंचारविषयो न भवति । तथा च मनुष्या- धिकारत्वाच्छास्त्रस्य तद्देशे मनुष्याभावात्तैस्तद्देशसंबन्धिगणितविशेषोऽनुक्तः । प्रयोजना- भावात् । न च षट्षडक्षांशावधिमनुष्यसंचारसंभवात्तत्र कथमिदं संभवतीति वाच्यम् । मनुष्यसंचारसंबद्धदेशगोलस्थित्युक्तचरादिसाधनस्य तत्र गोलस्थितिसंवादेनानिवार्यत्वात् । एवं च चराद्युक्तसाधने तद्देशस्यालक्ष्यत्वेनाव्याप्तिर्नेति भावः ॥२५॥ केदारदत्तः—भूगोल में कुज्या-चरज्या अग्रा-आदि से सम्बन्ध रहित स्थान बताये जा रहे हैं— भूमण्डल में जिस जगह अक्षांश ६६ से अधिक होगा वहां पर लम्बांश २४ से अर्थात् परम क्रान्ति से कम होता है । अतः वहां पर के द्युज्या व्यासार्ध से निर्मित अहोरात्र वृत्त सदा क्षितिज से ऊपर रहने से उन स्थलों में, क्षितिज स्पर्श के अभाव से कुज्या चर अग्रा आदि का अभाव स्वतः सिद्ध होता है । उपपत्ति—निरक्ष क्षितिज और स्वक्षितिज के बीच में अहोरात्र वृत्त में कुज्या (द्युज्या वृत्त में) की स्थिति होती है । उस देश में सभी ६ राशियां क्षितिज के ऊपर रहती हैं वहां रवि सदोदित रहता है, अतः क्रान्ति वृत्त के क्षितिज स्पर्श के अभाव से वहाँ चर कुज्यादि का अभाव स्वतः सिद्ध है । वहाँ पर कुछ राशियां सदोदित और कुछ राशियाँ सदा अस्त रहती हैं । और कुछ राशियां तो प्रान्त से अर्थात् अन्तिम भाग से उदित होती हैं ॥ संदोदित रवि की स्थिति में रवि निष्ठ अहोरात्र वृत्त से सम्पात ही नहीं होने से तथा क्षितिज वृत्त और निरक्ष क्षितिज वृत्त (उन्मण्डल) के परस्पर में सम्पात का ही अभाव होने से चरादिक अग्रा आदि का काल का वहाँ अभाव स्वतः सिद्ध हो जाता है ॥२५॥