भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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पृष्ठ 408

३०६ गोलाध्याये उपपत्ति—आचार्य ने उक्त विषय की स्पष्टता के लिये उदाहरण दिया है कि ५ अंगुल पलभा के नगर में, स्पष्ट अहोरात्र का मान घटी ६०-पल ७ और विपल २ होता है। अभीष्ट इस नगर में यदि ६०।७।२ इष्टकाल में लग्न साधन करते हैं तो स्पष्ट सूर्य से लग्न मान अधिक आता है और यदि औदयिक स्पष्ट सूर्य से लग्न बनाई जाती है तो तूर्यं स्पष्ट के तुल्य ही लग्न आती हैं। इस प्रकार अन्वय व्यतिरेक से सूर्य का तात्कालिकी करण उचित नहीं समझा जा रहा ? तो अर्क तात्कालिकीकरणगणित गोल से ठीक नहीं है क्या ? तहीं, अर्कतात्कालिकीकरण ही गणित गोल से सही है। यदि इष्ट घटिका सावन हैं तो उन्हें नाक्षत्र मान में परिणत करना चाहिए। अनुपात से राश्युदयपल × गतिकला ---------------------------------------------------- १८०० = फल। ६० घटी + फल = सावनेष्टम् तुल्य नाक्षत्र घटिका। राश्युदयपल × इष्ट सम्बन्धी ग्रह गति तथा -------------------------------- = इष्टकालीन ग्रह केवल इष्ट १८०० घटिका + इष्टकालीन ग्रहासु = नाक्षत्रे ष्ट होता है। इस प्रकार सावन मान के लिये स्पष्ट सूर्य का तात्कालिकी करण करने से सावन इष्ट घटिकायें नाक्षत्रेष्ट घटिका हो जाने से राश्युदयासुओं के साथ योग वियोग उचित होता है। यदि ऐसा ही ठीक है तो इष्टकाल को ही नाक्षत्र में क्यों नहीं मापा गया ? ठीक तो है किन्तु ग्रहवेधादि से जो छाया आदि उपलब्ध होती है वह सावन दिन सम्बन्धी ग्रह गणित उपकरणों से प्रत्यक्ष उपलब्ध होने से सावन इष्ट काल का नाक्षत्र मान में परिणत करने के लिये स्पष्ट सूर्य का तात्कलिकी करण उचित है। क्षेत्र देखिए।

[चित्र: क्षितिज वृत्त पूर्वापर वृत्त नाड़ी वृत्त ता. र. उदयरवि याम्योत्तर वृत्त क्रान्तिवृत्त]

ता० र० = तात्कालिक सूर्य रवि । उ र = उदय रवि ।