सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नवासना ३१५ ज्यात्[ल्या]कारत्वेन या स्याद्रवेरुन्नतकालजीवाऽभीष्टा हृतिः सा प्रथमं प्रकल्प्या, इत्युक्त- रीत्या वा तदुक्तौ न क्षतिः ॥३४॥ केदारदत्तः —शङ्कु साधन विधान बताया जा रहा है— क्षितिजाहोरात्रवृत्त सम्पात से अहोरात्रवृत्तस्थ ग्रह तक अहोरात्र वृत्त में उन्नतांश चाप अथवा यत्र कुत्र स्थान स्थित ग्रहोपरिगत दृङ्मण्डल वृत्त में क्षितिज से ग्रहबिम्ब तक उन्नतांश की ज्या का नाम शङ्कु एवं खमध्य से ग्रह बिम्ब तक उन्नतांश ज्या भुज होती है। इस उन्नतांश ज्या का नाम शङ्कु और नतांश की ज्या का नाम भुज सर्व साधारण से प्रसिद्ध हैं। ग्रहवेध से दृष्ट इष्ट छाया, ग्रह के सावनात्मक इष्ट काल में हो दृष्टिपथ में होती है। उपपत्ति—उदय और अस्तक्षितिजाहोरात्र वृत्त सम्पात से उभयतः पूर्वा पर गत सूत्रों का नाम सोदयास्त सूत्र एवं क्षितिजाहोरात्र वृत्त और उनमण्डल वृत्त के दोनों सम्पातगत सूत्रों का नाम निरक्षोदयास्त सूत्र होता है। ग्रह बिम्ब से क्षितिज धरातलगत सूत्र का नाम शङ्कु तथा ग्रह बिम्ब से अहोरात्र वृत्त व्यासार्ध तक गत सूत्र का नाम उन्नतकाल ज्या होती है। उन्नतकालज्या मूल और शङ्कुमूल का अन्तर शङ्कुतल भुज होता है। तथा ग्रह बिम्ब से सोदयास्त सूत्रगत लम्बाकार सूत्र का नाम इष्ट हृति होती है, गोल दर्शन से स्फुट है। अक्षांश वशात् साक्ष देश में हृति तिर्यक् लम्बरूपिणी हो जाने पर भी वह इष्ट शङ्कु की तरह नहीं होती है। क्षेत्र देखिये— ग्र = ग्रह ग्रमू = शङ्कु ग्रच = उन्नतकाल ज्या ग्रहृ = इष्ट हृति मूहृ = शङ्कुतल ध्यान देकर बुद्धिगत गोल की स्थिति के अनुसार उक्त क्षेत्र से इष्ट हृति और शङ्कु विषय ठीक समझ में आता है ॥३४॥