सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहणवासना ३३९ स्यैव राहोर्ग्राहकत्वसिद्धौ राहुः कुभामण्डलग् इत्यादिकल्पनं गौरवमावहतीत्याहुस्तच्चि- न्त्यम् । चन्द्रस्य विक्षेपवृत्ते गमनकल्पनया चन्द्रपातस्थानस्य तदाकर्षकत्वावश्यकतया तत्र तदधिष्ठातृभूतदेवतात्वेन राहोरसुरस्यावस्थानासम्भवात् । तत्स्थानस्य राहुसंज्ञत्वेऽप्याकाशा- त्मकतया व्यवधायकत्वासंभवेन ग्राहकत्वासंभवाच्च । किंच भवत्कल्पनाद्राहोर्दू रस्थितत्वमेव न पूर्वापरान्तराभावः । अस्मन्मते छादकसमत्वेनावस्थानकल्पनात्तथा परम्परासम्बन्धान- पेक्षणात् । अपि च ब्रह्मदत्तवरप्रसादात्पातस्थानमधिगतं न कथं भूभाचन्द्रयोः स्थानं लाघवात्स्वशत्रुमांनिन्ध्याच्च । अत एव श्रीपतिना तथैवोक्तं 'भूच्छायायां प्रविष्टः स्थगयति शशिनं शुक्लपक्षावसाने राहुर्ब्रह्मप्रसादात्समधिगतवरस्तत्तमो व्यासतुल्यः । ऊर्ध्वस्थं भानु- बिम्बं सलिलमयनोरप्यधोवति बिम्बं संसृत्यैवं च मास्यव्युपरतिसमये स्वस्य साहित्य- हेतोरिति । परे तु रहयति गृहीत्वा चन्द्रार्कौ त्यजतीति राहुरिति व्युत्पत्त्या भूभाचन्द्रयोरेव चन्द्रसूर्यच्छादनकारकत्वाद्राहुत्वमित्याहुः ॥१०॥ केदारदत्तः—सूर्य चन्द्र ग्रहणों में छादक निर्णय— सूर्य और चन्द्रमा के छादकों का विश्लेषण— चन्द्र ग्रहण में—सूर्य के छादक से चन्द्रमा का छादक पृथुतर है, इसलिये कि चन्द्र बिम्ब के आधे के तुल्य छाद्य होने से चन्द्र बिम्ब दर्शन में कुण्ठता और स्पार्शिकादि स्थिति दीर्घ घटित होती है, तथा सूर्य बिम्ब दर्शन में तीक्ष्णता और स्पर्शादि स्थितियां कम समय की देखी जाती हैं । तथा सूर्यग्रहण में चन्द्रबिम्ब छादक होता है, अतः अर्ध ग्रसित सूर्य बिम्ब में शृङ्गों में तीक्ष्णता और स्पर्शादि स्थिति कम समय की होती है । इससे सूर्य का छादक बिम्ब चन्द्र छादक बिम्ब से लघु मालूम पड़ता है । इस प्रकार सूर्य और चन्द्र ग्रहणों में दोनों का छादक राहु नहीं है, जैसा राहु कृत सूर्य चन्द्र ग्रहणों का पुराणों में उल्लेख हुआ है । वस्तुतः सूर्यग्रहण में चन्द्रमा ही छादक और चन्द्र ग्रहण में भूछाया के ही छादिका होने से भूच्छाया ही चन्द्रग्रहण में ग्रहण का कारण है न कि राहु । तथा सूर्य ग्रहण अमान्त में और चन्द्र ग्रहण पूर्णान्त में होता है । दोनों ग्रहणों का काल भिन्न है । सूर्यग्रहण में पश्चिम में स्पर्श पूर्व दिशा में मोक्ष होता हैं और चन्द्रग्रहण में पूर्व में स्पर्श पश्चिम में मोक्ष होता है । यह भी दिग्विभिन्नता है । राहु तो एक ही है ऐसा अर्थात् दोनों ग्रहणों में राहुकृत ग्रहण कैसे माना जाय ? भूमण्डल में सूर्य ग्रहण कहीं पर दृश्य और कहीं पर पूर्ण सूर्य बिम्ब अदृश्य होता है, किन्तु चन्द्र ग्रहण का स्पर्शादिग्रहणदर्शन भूमण्डलस्थ सभी (अपने-अपने क्षितिज में उदित चन्द्र से) एक समय से देखते हैं, इस प्रकार दिशा, देश और समय की विभिन्नताओं से राहु कृत ग्रहण नहीं होता । खगोल मर्मज्ञ, अभिमानी गणितज्ञों का उक्त मत सही है भी तो वेद-पुराण और संहिता शास्त्रों के अनुसार उक्त कथन सही नहीं है । तब कैसे समन्वय किया गया ? तब आचार्य वेद शास्त्रों से सम्मत अर्थ विषय की पुष्टि के लिये कह रहे हैं कि—