भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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पृष्ठ 442

३४० गोलाध्याये राहु भूच्छाया में घुसकर चन्द्रमा को और चन्द्रमा में घुस कर सूर्य को छादित करता है, स्वरूपतः राहु एक महान् अन्धकार भी है। अतः राहु कृत सूर्य चन्द्र ग्रहणों से पृथ्वी में अन्धकार ही होता है—इत्यादि इस प्रकार के अर्थ से सभी आगमशास्त्रों का कथन की ज्योतिष से सुन्दर समन्वय किया जा सकता है आचार्य का भाव स्पष्ट है ।।७।।८।।९।।१०।। इदानीं ते लम्बनावनती कुतो हेतोः कुत इति कुदलेन साध्येते इत्यस्य प्रश्न- स्योत्तरमाह— यतः क्वधोच्छ्रितो द्रष्टा चन्द्रं पश्यति लम्बितम् । साध्यते कुदलेनातो लम्बनं च नतिस्तथा ॥११॥ वा० भा०—स्पष्टम् ।।११।। मरीचिः—अथ किं तैः सिद्धे कुतः कुत इति प्रश्नस्योत्तरमाह—यतः क्वधोच्छ्रित इति । इतः प्रभृत्यधिकारान्तमनुष्टुप्छन्दः । यतः कारणात् । भूव्यासार्धयोजनैर्भूगर्भादुच्च- स्थितो भूपृष्ठस्थः । द्रष्टा मनुष्यः । लम्बितं चन्द्रं पश्यति । पूर्वं प्रतिपादितत्वात् । अतः कारणाल्लम्बनं भूव्यासार्धयोजनैः साध्यते । लम्बनस्य भूव्यासार्धोच्छ्रितत्वेनोत्पन्नत्वादिति भावः । तथा तत्कारणादेव नतिः । चः समुच्चये । भूव्यासार्धयोजनैः साध्यते । उभयोस्त- दुच्छ्रितत्वेनोत्पन्नत्वादुभयोस्तत एव साधनं युक्तमिति भावः ॥११॥ केदारदत्तः—लम्बन और नति साधन का नामकरण— आचार्य ने इस अधिकार का यहाँ पर ग्रहण वासना नामकरण किया है—ग्रहण वासना का तात्पर्य सूर्य चन्द्र ग्रहण कैसे होते हैं इस ग्रह गणित की उपपत्ति से आचार्य का तात्पर्य है। वस्तुतः ग्रह गणिताध्याय में पर्व सम्भव अधिकार से चन्द्र सूर्य दोनों ग्रहों के ग्रहणों पर पूरा विचार हो चुका है। चन्द्र ग्रहण की अपेक्षा सूर्य ग्रहण में गणित विषय विशेष हैं जिन पर गणिताध्याय में उन विषयों के गणितों का पूर्ण उल्लेख आचार्य स्वयं कर चुके हैं। तिस पर भी आचार्य की मनस्तुष्टि नहीं हो पाई है। अत एव ग्रह गोलाध्याय की रचना में यहाँ पर ग्रहण वासनाधिकार में सूर्य ग्रहण के सविशेष गम्भीर विषयों पर आचार्य ने विशेष प्रकाश दिया है— अनन्त ब्रह्माण्ड के इस आकाश में पृथ्‍वी से देखने वाला व्यक्ति अपने भूपृष्ठ से आकाश दर्शन करता है तथा सारा ग्रहगणित की रचना भूकेन्द्राभिप्रायिक हुई है, तो स्पष्ट है भूगर्भ से भूव्यासार्ध की दूरी पर द्रष्टा के स्थिति होने से, अपनी कक्षा स्थित भूगर्भीय ग्रह को, द्रष्टा पृष्ठ स्थान से पूर्वा पर और याम्योत्तर रूप में ग्रहों को लम्बित और नत (झुकाव) रूप में देखता है। अतः भूव्यासार्ध जन्य अन्तर ज्ञान से उत्पन्न नति और लम्बन नाम के दो संस्कार गर्भीय ग्रह में देने से वे ग्रह दृश्य अर्थात् पृष्ठोय दृष्टि के लिये स्पष्ट हो जाते हैं अत एव गर्भीय ग्रह में लम्बन और नति संस्कार आवश्यक हो जाते हैं ।।११।।