भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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। ३४४ गोलाध्याये लगी वहीं पर चन्द्रमा लम्बित है अथवा रवि कक्षागत पृष्ठ सूत्र जहाँ चन्द्र कक्षा में लगता है वहाँ पर गर्भ सूत्र से चन्द्रमा लम्बित होता है । जिस समय सूर्य और चन्द्रमा खमध्य में रहते हैं उस समय गर्भ और पृष्ठ सूत्र की एकता से लम्बन का अभाव हो जाता है । उपपत्ति—पृ त यल = भू बिम्ब ख च चं क्षि = चन्द्र कक्षा खसू स्, क्षि' = सूर्य कक्षा भू चं सू = गर्भ सूत्र पृ चं सू = पृष्ठ सूत्र = पृ च सू सू सू' = रवि कक्षा में लम्बन कला पूर्वापरा च चं = चन्द्रकक्षा में लम्बन कलापूर्वापरा ∠ सू चं सू = ∠ पृ चं भू अतः दोनों कक्षाओं में लम्बन कला मान तुल्य होता है । पृ ख ख सूत्र में रविचन्द्रमा जिस समय होते हैं, उस समय गर्भीय अमान्त = पृष्ठीय अमन्त होने से लम्बन का अभाव होता है । श्लोक दर्शन से सभी विषय सुस्पष्ट हो रहे हैं ॥१२।१३।१४।१५।१६॥ इदानीं नत्युपपत्तिमाह— अथ याम्योत्तरायां तु भित्तौ पूर्वोक्तमालिखेत् । १७॥ ये कक्षामण्डले तत्र ज्ञेये दृक्क्षेपमण्डले । त्रिभोनलग्नदृग्ज्या या स दृक्क्षेपो द्वयोरपि ॥१८॥ तच्चापांशैरनतौ बिन्दू कृत्वा चित्रिभसंज्ञकौ ।