भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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पृष्ठ 448

३४६ गोलाध्याये ऽर्कै। कक्षयोश्चन्द्रकक्षाचन्द्रदृग्वृत्तयोर्याम्योत्तरमन्तरं नतिः। अयं भावः-भूगर्भात्सूत्रं दर्शान्ते सूर्यबिम्बावधिनीतं चन्द्रचिह्नं भेदति। भूपृष्ठान्नति तथा सूत्रं चन्द्रचिह्ननदृग्वृत्तं लगति। तत्र स्थाने चन्द्रबिम्बाधिष्ठिताकाशगोलस्थक्रान्तिवृत्तयाम्योत्तरदिग्रूपकदम्बद्वयप्रोतचलवृत्त- मानीय चन्द्रगोलस्थक्रान्तिवृत्ते यत्र लगति तत्स्थानयोश्चलवृत्ते यदन्तरं तन्नतिसंज्ञम्। चलवृत्तस्य क्रान्तिवृत्तयाम्योत्तरवृत्तत्वादिति। ततस्तत्कारणात्। सा नतिः। दृक्क्षेपात्। चकारोऽन्ययोगव्यवच्छेदार्थेवकारपरः। साध्यते। केवलयाम्योत्तरान्तरस्य दृक्क्षेपवृत्त सत्त्वा- दिति भावः ॥२०॥ **केदारदत्तः-**नति साधन के लिये च्छेद्यक, याम्योत्तरभित्ति में बनेगा- जैसे, लम्बन पूर्वापर भित्ति में दर्शाया गया है उसी प्रकार नति भी याम्योत्तर भित्ति में पूर्ववत् दिखानी चाहिए। क्योंकि गर्भ पृष्ठ सूत्र का पूर्वापर अन्तर लम्बन है तथैव गर्भ पृष्ठ सूत्रों का याम्योत्तर अन्तर का नाम नति होती है। दर्शान्त काल में स्पष्ट लग्न में ३ राशि कम करने से वित्रीभ लग्न होती है। लम्बन साधन में जो सूर्य चन्द्र की कक्षायें दिखाई गई हैं नति साधन में दोनों के वित्रिभ लग्न के ऊपर खमध्यद्वय गत वृत्त दृक्क्षेप वृत्तों में जो याम्योत्तरान्तर वही नति होती है। दर्शान्तकाल में वित्रिभ लग्न को दृग्ज्या का नाम दृक्क्षेप होता है, इस प्रकार दर्शान्त में चन्द्रसूर्य स्पष्ट की एकता से यह दोनों का दृक्क्षेप होता है। चन्द्रमा के शरा- भाव काल में यह स्थिति ठीक है। वस्तुतः यदि चन्द्रमा शराग्र में है तो आचार्य ब्रह्म- गुप्त के मत से चन्द्रदृक्क्षेप में चन्द्र शर संस्कार आवश्यक होता है। दृक्क्षेप चाप तुल्य नतांशों से खमध्य से चन्द्र सूर्य को नत कर नत स्थान में बिन्दु (चिह्न) करना चाहिए। खमध्य से सूर्य चन्द्रमा दृक्क्षेप के अंश तुल्य बिन्दु पर वित्रिभ में नत होते हैं। अतः लम्बन क्षेत्र दर्शन की तरह नत सूर्य चन्द्रबिम्बों पर भूगर्भ और भूपृष्ठ सूत्रों का लम्बन की तरह जो अन्तर होगा वही यहाँ पर नति नाम सूर्यचन्द्रमा का याम्योत्तर अन्तर समझना चाहिए। वित्रिभ लग्न स्थान में सूर्य चन्द्र का जो याम्योत्तरान्तर होता है वही अन्तर सर्वत्र होता है। जिस प्रकार नतांश दृग्ज्या से पूर्वापर लम्बन अन्तर रूप साधन किया गया है उसी प्रकार दृक्क्षेप से याम्योत्तरान्तर साधन किया जाता है।