भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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ग्रहणवासना ३७७ लल्लाचार्य के वलन साधन गणित में नत की क्रम ज्या की जगह नत की उत्क्रम ज्या गणित साधन भ्रम का प्रकारान्तर (अन्य प्रकार) से निराकरण— अहोरात्रवृत्त क्रान्तिवृत्त सम्पात बिन्दु पर मुद्रिकाकार (अँगूठी की तरह) ग्रह बिम्ब के निवेशन स्थान पर अर्थात् बिम्ब की परिधि पर जहाँ अहोरात्रवृत्त लगता है वहाँ से क्रान्ति वृत्त दक्षिणोत्तर दिशा में जहाँ पर अन्तरित होता है वहाँ से पूर्वापर वृत्त ग्रह तक वलन होता है । इस स्थल पर, सूर्य की क्रान्ति में ग्रह बिम्बार्धककला युक्त सूर्यं की क्रान्तियों का जो अन्तर होता है उसे तत्कालीन क्रान्त्यन्तर समझिये । इसका साधन, सूर्य भुज साधनावसर पर जो भोग्य खण्ड होता है उस भोग्य खण्ड से गुणित बिम्बमानार्ध कला और २२५ से भाग देने पर सूर्य की तत्कालीन भुजज्याओं का अन्तर होता है । इसे अ मानिये तो स्फुट भोग्य खण्ड ज्ञान के लिये २२५ X अ यदि ───────────────── = स्फुट भोग्य खण्ड । त्रि तुल्य कोटि में स्फु भो. ख X बिम्बार्ध पुनः ────────────────────── = दोर्ज्यान्तर । २२५ स्फु भो खं बिम्बार्ध X २२५ = ────────────────────────── = दोर्ज्यान्तर २२५ त्रि स्फु भो ख X बिम्बार्ध ──────────────────────── = दोर्ज्यान्तर । त्रि अतः क्रान्ति साधन के लिये जिनज्या X दोर्ज्यान्तर ──────────────────────── = क्रान्त्यन्तर त्रि यह क्रान्त्यन्तर बिम्ब व्यासार्ध में है, अतः अनुपात से त्रिज्या व्यासार्ध वलन = जिनज्या X दोर्ज्यान्तर X त्रि दोर्ज्यान्तर X जिनांशज्या ─────────────────────────── = ─────────────────────────── त्रि X त्रि त्रि = क्रान्त्यन्तर यह क्रान्त्यन्तर बिम्ब व्यासार्ध में वलन ज्या का चाप वलन होता है । वलन ज्या X त्रि अनुपात से पुनः, ───────────────── बिम्ब व्यासार्ध वृत्त वलन ज्या में उत्थापन देने से दोर्ज्यान्तर X जिनांशज्या X त्रि ───────────────────────────────── = त्रि X बिम्ब व्यासार्ध