सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ गोलाध्याये त्पन्नक्षेत्राकद्युज्याकोटौ त्रिज्याकर्णस्तदा क्रान्त्यन्तररूपवलनज्याकोटौ कः कर्ण इत्यनुपातेन कदम्बाभिमुखं कर्णरूपं वलनं भवतीति न किंचिद्विरुद्धमिति भावः ॥७४॥ अथाऽऽरब्धाधिकारो निरूपित इति फक्किकयाऽऽह - इति ग्रहणवासनेति । ग्रहणाधि- कारोक्तकठिनपदार्थानामुपपत्तिर्निरूपितेत्यर्थः । दैवज्ञवर्यगणसंततसेव्यपार्श्वश्रीरङ्गनाथगणकात्मजनिर्मितेऽस्मिन् । याता शिरोमणिमरीच्यभिधे समाप्तिं सूर्येन्दुपर्वगणितोक्तिसुवासनेयम् ॥ इति श्रीसकलगणकसार्वभौमरङ्गनाथगणकात्मजविश्वरूपापरनामकमुनीश्वरगणक- विरचिते सिद्धान्तशिरोमणिमरीचावुत्तराध्याये ग्रहणाधिकार- वासनाधिकारः संपूर्णः ॥ केदारदत्तः—ग्राह्य बिम्ब में, सूर्यग्रहण में सूर्य बिम्ब पर और चन्द्रग्रहण में चन्द्रबिम्ब पर ग्रहण का स्पर्श, मध्य, मोक्ष सम्मीलनोन्मीलनादि किस दिशा में किस बिन्दु पर होंगे— वलन गणित का साधन क्रम ज्या गणित से ही करना चाहिए । लल्लाचार्य तथा श्रीपति प्रभृति आचार्यों ने वलनगणित साधन में नत काल की क्रम ज्या की जगह नत काल उत्क्रम ज्या ग्रहण की है जो गोलज्ञान बहिर्भूत और युक्तिशून्य है । ग्रह बिम्ब का स्पर्शादि बिन्दु, बिम्ब के पूर्व पश्चिम आदि दिशा के किस बिन्दु से किधर वलयित है अर्थात् झुकाव है वह स्पार्शिक बिन्दु जो वलयित होता है उसी के गणित ज्ञान को वलन गणित कहा जाता है । विषुवद्वृत्त को समवृत्त मान कर याम्योत्तर वृत्तगत ग्रह से अयन वलन की उपपत्ति समझनी चाहिए । क्रान्तिवृत्त पर लम्बरूप कदम्बप्रोत वृत्त के उत्तर दक्षिण कदम्ब नामक दो पृष्ठीय केन्द्र होते हैं तथा विषुववृत्त के दो पृष्ठीय केन्द्र उत्तर दक्षिण ध्रुव भी प्रसिद्ध हैं । जिस समय मकरा'दि बिन्दु, याम्योत्तर वृत्त में रहेगा तो कदम्ब भी उस समय याम्योत्तर में रहने से उस समय ध्रुव और कदम्ब की एकवृत्तीय स्थिति से क्रान्ति विषुवद्वृत्त के अन्तर का अभाव गोलदर्शन से स्पष्ट है । उपपत्ति सहित व्याख्या—पुनः याम्योत्तर वृत्त का कुम्भादि स्थान राशि वृत्त के मध्य में कुम्भ राश्युदयासुमान = १९३५ ÷ ६० = ३२।१५ कालांशों से कदम्ब याम्योत्तर वृत्त सम्पात से ३२।१५ कालांशों में कुम्भादि बिन्दु पश्चिम दिशा में लम्बित रहेगा । क्योंकि कदम्ब ओर याम्योत्तर सूत्रों का अन्तर कोण ही वलन कहा गया है । उस कोण की ज्या उक्त अंशों की क्रमज्या ही होती है न कि उत्क्रम ज्या । ज्या चाप के मध्य में बाण रूप उत्क्रमज्या का इस स्थल पर बलन का मान कैसे कहा जावेगा ? क्योंकि क्रान्ति- मण्डल प्राची से विषुवन्मण्डल प्राची के अन्तराल के चाप का कोणमान कदम्ब सूत्र में ध्रुव और कदम्ब सूत्रों से उत्पन्न कोणमान ग्रह क्षितिज में अयनवलन हैं । वह क्रम ज्या ही होती है वह उत्क्रम ज्या कदापि नहीं होती है ।