सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहणवासना ३७९ वलनज्या × त्रि ──────────────── , वलन ज्या का उत्थापन देने से द्युज्या नतांश क्रमज्या— अक्षज्या × त्रि ──────────────── द्यु × त्रि नतांश क्रम ज्या × अक्ष ज्या = ───────────────────────────── = स्थूलाक्षवलन ज्या होती है । द्यु अथवा—सत्रिभग्रहोपरिगत ध्रुवप्रोतनाडी वृत्तोत्पन्न कोण समकोण होता है । तथा क्रान्तिवृत्त नाड़ी वृत्तोत्पन्न कोण = जिनांश तुल्य । सत्रिभग्रह की ज्या = खेट कोटिज्या अतः प न स त्रिभुज में सत्रि ग्रज्या × जिनज्या ──────────────────────── सत्रिभग्रह की क्रान्ति ज्या यह क्रान्ति ज्या ध्रुव प्रोत वृत्त में त्रि होती है, किन्तु अपेक्षित है ग्रह क्षितिज वृत्त में । ग्रहोपरिगत ध्रुव प्रोत वृत्त में ९०-क्रान्ति का नाम 'द्युज्या चाप परिभाषया स्पष्ट है । ग्रह क्षितिज में द्युज्या का मान = ∢ ल त म सत्रिभग्रह भु = त प सत्रिभग्रक्रां ज्या × त्रि प त स त्रिभुज में ──────────────────────── = ग्रह क्षितिज में अयन वलन ज्या । सत्रि- द्युज्या भ क्रांज्या का उत्थापन देने से सत्रि ग्र-ज्या × जिन ज्या × त्रि खेट कोज्या × जिन ज्या ───────────────────────────────── = ───────────────────────── त्रि × द्यु द्यु सूक्ष्म आयन वलन ज्या उत्पन्न होती है । [चित्र में पाठ:] नाड़ीवृत्त, क्रान्ति वृत्त, ग्र, क· ग्रहो.ध्रु.प्रो., म, अयन प्रो. वृ., क त, प, सत्रि ग्रहो.ध्रु.प्रो., सत्रि·ग्र·