सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० गोलाध्याये आक्ष वलन के लिये— याम्योत्तर ध्रुव प्रोतवृत्तोत्पन्न कोण का मान = नतकाल की ज्या । = नतज्या । तथा याम्योत्तर समप्रोतवृत्तोत्पन्न कोण सममण्डलीय नतांश की ज्या = स० म० नत ज्या । समस्थान से ग्रह तक उपवृत्त व्यासार्ध की ज्या = उ० वृ० ज्या । समस्थान से अक्षांश मान से विधीयमान वृत्त = अक्षांशवृत्त की ज्या = ज्या अक्ष । ध्रुव से ग्रह तक लम्ब वृत्त में = ज्या लं० समम-नज्या × अक्षज्या अनुपात से -------------------------- = आक्ष वलन । ग्रह द्यु अक्षज्या × सम मण्डलीयनतज्या पुनः ---------------------------------- = द्युज्या वृत्त में अक्षज्या । त्रिज्या अक्षज्या × सम-नतज्या × त्रिज्या अक्षज्या × सम-नज्या उत्थापम से ------------------------------- = ----------------------- द्यु × त्रि द्यु सम म. न. ज्या ---------------- = आक्ष-व-ज्या द्यु अथवा भुजकोटि = उपवृत्त व्यासार्ध नतकालज्या × अक्षज्या अतः ----------------------------------- = आक्षवलन-ज्या उपपन्न होती है । उपवृत्त का सार्ध दृष्टान्त से उत्क्रम ज्या का निराकरण— जिस देश में वृषभान्त राशि के तुल्य अक्षांश २०°/३८' है उस देश में वृषभान्त का रवि बिम्ब मध्याह्न में खमध्य में स्थित होगा । निश्चय है कि उस समय क्रान्तिवृत्त का स्वरूप दृङ्-मण्डलाकार होगा । वृषान्त में ३ राशि जोड़ने से सत्रिग्रह सिंहान्त में होगा जो क्षितिज में रहेगा । सिंहान्त से पूर्वापर तक क्षितिज वृत्त में पूर्व स्वस्तिक से क्षितिजा- होरात्रवृत्त सम्पात तक सिंहान्त की अग्रा के तुल्य वलन यदि प्रत्यक्ष दृश्य है तो यह कैसे माना जाय कि सत्रिभगृह की क्रान्ति की उत्क्रम ज्या वलन होती है । आचार्य भास्कर के वलनायन प्रकार के अतिरिक्त कोई भी सिद्धान्त अन्य किसी प्रकार से भी यहाँ अग्रा के तुल्य वलन नहीं ला सकता । क्रमज्या गणित साधन प्रकार ही वलन साधन में सर्वथा उपयुक्त है आचार्य का यही भाव है । और एक महान उदाहरण— जिस देश में अक्षांश = ६६, उस देश में मेषराशि के साथ सभी राशियाँ क्षितिज में होती हैं अर्थात् उस देश में क्रान्ति वृत्त ही क्षितिज वृत्त हो जाता है । वहाँ पर मेष-वृष- मिथुनादि में स्थित सूर्य का परम वलन = त्रिज्या तुल्य होता है । क्योंकि क्रान्ति वृत्त से प्राची दिशा उत्तर को होती है ।