भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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ग्रहणवासना ३८१ शराभाव की स्थिति में सूर्यग्रहण का स्पर्श दक्षिण दिशा से होता है और चन्द्रमा का ग्रहण स्पर्श उत्तर से होगा । इसलिये वहाँ त्रिज्या तुल्य वलन की अन्यथासिद्धि से क्रमज्या प्रकार से ही वलन गणित की साधना समीचीन होती है । तथा जिस देश में अक्षज्या = ३१।४० मेषादिगत सूर्य द्युज्या = ३४३८ चरासु = ०, क्षितिजस्थ सूर्य में नतघटिका = १५, आयनवलनज्या का चाप = २४° आक्षवलनांश = ६६ स्फुटवलन = ६६ + २४ = ९०° एवं वृषादि रवि की द्युज्या = ३३३६, चरज्यासु = १६७०, नतघटिका = १९।३८, आयन चापांश = ९०, एवं मिथुनादि सूर्य में द्युज्या = ३२१८, चरासु = ३४६५, नत- घटिका = २४।३७, आयनवलनांश = १२।३२, आक्ष वलन = ७७, स्फुट वलन = ९० यही सर्वत्र क्रमज्या प्रकार से ही सही सिद्ध होते हैं । इसी आशय को श्लोक से भी आचार्य ने “यत्खवस्वस्तिकगे खौ भवलये दृग्वृत्तवत्सं- स्थिते....व्यासार्धतुल्यं कथम्” स्पष्ट किया है ॥३०-७४॥ इति सिद्धान्तशिरोमणि ग्रहगोलाध्याय के ग्रहणवासनाध्यायः—९ की श्री पं० हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्त जोशी कृत “केदारदत्तः” हिन्दी व्याख्या सम्पन्न ।

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