सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउदयास्तवासना ३८३
समध्रुवाभिमुखत्वासंभवादिति ध्येयम् । कुत इत्यतः कारणमाह-असाविति । ग्रहशरः कदम्बोन्मुखः क्रान्तिवृत्ताद्विक्षेपवृत्तावधि दक्षिणोत्तरान्तरस्य क्रान्तिवृत्तयाम्योत्तराभिमुखस्य शरत्वात् । अत एव ग्रहबिम्बनामनोन्नामने द्विधोत्पन्ने इत्याह—तदिति । तस्य ग्रहबिम्बस्य उन्नामनं नामनम् । चः समुच्चये । क्षितिजात् । द्विप्रकारेण संभवति । तथा हि—उद्- वृत्ताद्ग्रहबिम्बमुन्नामितं नामितं च भवति । स्वक्षितिजवृत्ताच्च नामितमुन्नामितं च भव- तीति । ताभ्यां दृक्कर्मद्वयमुत्पन्नमित्याह—आयनमिति । तेन । उन्नामननामनयोः प्रत्येकं द्वित्वोत्पन्नत्वेनेत्यर्थः । कर्मद्वयं दृक्कर्मणो द्वैविध्यं सिद्धम् । ते संज्ञया विभजते — आयन- मिति । उद्वृत्तादुन्नामननामनाभ्यामुत्पन्नं दृक्कर्म आयनदृक्कर्म । क्षितिजादुन्नामननाम- नाभ्यामुत्पन्नं दृक्कर्म आक्षदृक्कर्म । क्षितिजस्याक्षांशसंबन्धात् । चः समुच्चये । नन्वनयो- र्विवेकैन स्वरूपं न निरूपितमित्यत आह—तत्प्रपञ्च इति । तयोरायनाक्षदृक्कर्मणोः प्रपञ्चः स्वरूपगणितादिविचारः पुनर्विशेषतया संविविच्य भिन्नभिन्नतया तद्विचारं निश्चित्य मया उच्यते प्रतिपाद्यते ॥२॥ केदारदत्तः—ग्रह बिम्बदर्शन कब और कैसे होता है— क्रान्तिवृत्त में जिस समय ग्रह स्थान की राश्यादि क्षितिज में उदित होती है तो उस समय ग्रहबिम्ब क्षितिज में नहीं रहता । ग्रह अपने शराग्र में कदम्बवृत्ताभिमुख है, इस- लिये ग्रह स्थान के उदय शर से पहिले या बाद में आयन और आक्ष संस्कारों से संस्कृत ग्रह की स्थानीय राश्यादि जनित काल (समय) के पूर्व या पश्चात् में ग्रह बिम्ब का क्षितिज में दर्शन होता है । इसलिये यहाँ पर भी ग्रह स्थानीय राश्यादि बिन्दु में पुनः आयन और आक्ष दृक्कर्म संस्कार आवश्यक हो जाते हैं। क्योंकि दक्षिणोत्तर गमन सम्बन्ध से ग्रह बिम्ब क्षितिज के नीचे या क्षितिज के ऊपर रहेगा, भले ही ग्रह स्थान गणित से क्षितिज में है, किन्तु दर्शन तो ग्रह बिम्ब का ही अपेक्षित है । उपपत्तिः—यतः ग्रहबिम्बोपरिगत कदम्ब प्रोतवृत्त का क्रान्तिवृत्त के साथ जो सम्पात है वही ग्रह का राश्यादि स्थान है । स्थान के उदय के साथ ग्रह का उदय नहीं होगा क्योंकि ग्रह शराग्र में अपने विमण्डल में कदम्बाभिमुख है, यदि क्षितिजवृत्त कदम्बाभिमुख होता तो भी ग्रह का स्थान और ग्रह बिम्ब का एक समयावच्छेदेन उदय होना निश्चित है । जैसे क्षेत्र दर्शन से । विमण्डलस्थ ग्रह बिम्ब पर कदम्ब प्रोतवृत्त क्रान्ति वृत्त के साथ क्षितिजस्थ स्था, बिन्दु पर संयोग हो रहा है, अर्थात् ग्रह स्थान क्षितिज में होने से दृष्टिगत है, तो ग्रह बिम्ब, जो क्षितिज के नीचे ग्रह बिन्दु है अभी उदित नहीं हुआ है । क्योंकि ग्रह बिम्ब स्था वि; शराग्र में अभी नमित है । इसलिये स्था बिन्दु के उदय होने के पूर्व या पश्चात् में अर्द्धोदित ग्र बिंदु दृश्य होगा । इसलिए नमित ग्रह की क्षेत्रादि समुत्पन्ना