सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकल्पना ध्रुवाभिमुख की जाती है तो शराग्रस्थित ग्रह क्षितिज से नमित और उन्नमित ही होगा तो वहाँ आयनदृक्कर्म ही अनावश्यक है तो वे आचार्य दृश्यग्रह साधन में आयन- दृकर्म गणित का उपयोग क्यों करते हैं ? अर्थात् उन आचार्यों पर भास्कर का सही आक्षेप है । तथा परिलेख में बिम्ब मध्य से स्पष्ट वलनोपरि गत सूत्र क्रान्तिवृत्त प्राची होती है । तो उसमें कोटि की तरह शर दान की क्या आवश्यकता थी, उन्हें तो यह शर दान संस्कार भी ध्रुव सूत्र में ही करना चाहिये था, ऐसी स्थिति में शर को मान कर स्थित्यर्धानयन जो किया गया वह तो ध्रुवाभिमुख शर मानने से कैसे स्पर्श मोक्षादि स्थिति ठीक होगी या होती हैं ? ॥१३॥१४॥१५॥ अथोत्क्रमज्यानिवृत्तिमाह- दृष्टिकर्म वलनं च केनचिद्भ्रान्तितः कथितमुत्क्रमज्यया । तत्कृतं तदनुगैस्ततोऽपरैरन्धपूरुषपरम्परोपमैः ॥ १६ ॥ ब्रह्मगुप्तकृतिरत्र सुन्दरी साऽन्यथा तदनुगैर्विचार्यते । नोद्धता