भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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प्राक्कथन प्रस्तुत पुस्तक में भारत के प्राचीन ज्योतिर्विदों में अति महत्त्व का स्थान रखने वाले श्री भास्कराचार्य के प्रसिद्ध 'सिद्धांत शिरोमणि' के गोलाध्याय ग्रन्थ का सटीक विवेचन है। आजकल के पाठकों के लिये इस पुस्तक का विशेष रूप से लाभ लेखक की 'केदारदत्त' हिन्दी टीका एवं उपपत्ति के कारण है। संस्कृत जानने वाले तो मूल ग्रन्थ, उसका 'वासना भाष्य' एवं 'मरीचि' संस्कृत टीका का भी आनन्द ले सकते हैं। भास्कराचार्य को मैं पूर्व परम्परा के वैज्ञानिकों की मालिका का अन्तिम मणि मानता हूँ। उनका रचनाकाल था बारहवीं-तेरहवीं सदी में (११४४-१२२३ ईसवी सन्) । पहला ग्रन्थ 'सिद्धान्त शिरोमणि' उन्होंने लिखा ३६ वें वर्ष की आयु में और दूसरा ग्रन्थ 'करण कुतूहल' ६९ वर्ष की अवस्था में ! लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणित एवं गोलाध्याय ये पहले ग्रन्थ के चार खण्ड हैं जो भारत में गणित की पाठ्यपुस्तकों के रूप में पाँच सौ वर्ष अध्ययन के विषय बने रहे। फारसी में अनूदित हुए एवं उनकी कीर्ति योरप तक पहुँची। प्रस्तुत खण्ड से हमें भास्कराचार्य की बौद्धिक प्रगल्भता एवं तत्कालीन पार्श्व भूमि पर उनकी विषय की जानकारी के दर्शन मिलते हैं। प्रारम्भ में ही उपपत्ति ज्ञान की महत्ता वे स्पष्ट करते हैं (गोल प्रशंसाध्याय, श्लोक २-४) जिससे आधुनिक वैज्ञानिक या गणितज्ञ पूर्ण सहमत रहेगा। तत्कालीन विचार- धारानुसार भास्कराचार्य भी भूकेन्द्रित सिद्धान्त में विश्वास रखते थे (भुवन- कोश, श्लोक ३) लेकिन पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की कल्पना में (भुवनकोश, श्लोक ६) वे अपने समय से आगे थे। भुवनकोश के १३-१४ वें श्लोक में उन्होंने गोल पृथ्वी की परिधि का छोटा सा भाग समतल लगता है इस महत्त्व के नियम का प्रतिपादन किया था। उसी अध्याय के ५२ वें श्लोक में आचार्य ने पृथ्वी का व्यास १५८१ १/२४ योजन लिखा है। पाँच मील के योजन से यह मान ठीक उतरता है। फिर आगे चलकर मध्यगति वासना के पहले तीन श्लोकों से पृथ्वी के चारों ओर फैले वायुमण्डल की विभिन्न सतहों की चर्चा है जो आधुनिक अंतरिक्षज्ञान से तुलना में सही न होने पर भी कल्पना स्वरूप विचारणीय है। ग्रहों का पीछे जाना, सूर्योदय एवं सूर्यास्त के स्थानानुसार बदलने वाले समय, संपात बिंदुओं का सरकना, चंद्रमा पर से पृथ्वी के रूप की कल्पना एवं ग्रहणों का वैज्ञानिक