भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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विश्लेषण इन सभी बातों से भास्कराचार्य द्वारा प्राप्त खगोल विज्ञान की परि- पक्वता का हम अनुमान कर सकते हैं । इस खंड में ऐसे भी स्थान हैं जहाँ आचार्य ने परंपरागत विचारों से टक्कर लेने के बजाय उनसे समन्वय साधा है । ग्रहण वासना के श्लोक ७-१० में ग्रहणों की वैज्ञानिक मीमांसा करके भी आखिर राहु के अस्तित्व को भी मान लिया है । उसी प्रकार ज्योतिःशास्त्र का प्रयोजन फलित ज्योतिष के लिये है इस पूर्व परंपरागत विचारधारा को भी उन्होंने दोहराया है । आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से आज ये विचार गलत हैं पर हमें आज उनको तत्कालीन विचार परंपरा के कुशाग्रबुद्धि वैज्ञानिक पर पड़े दबाव के रूप में देखना है । इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ को प्रकाशित कर उसके विचारों की सोपपत्तिक चर्चा पाठकों के सामने प्रस्तुत कर पं० केदारदत्त जी ने जो महत्व का कार्य किया है उसके लिये मैं उन्हें बधाई देता हूँ । आशा है कि हमारी उज्ज्वल परंपरा के सबूत इस ग्रन्थ का रसिक बुद्धिजीवी पाठक स्वागत करेंगे । खगोल भौतिकी विभाग, जयंत विष्णु नार्लीकर टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, बम्बई अक्टूबर, १९८७