भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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अथवा २रा—३रा = ११ राशि कुम्भ राशि पश्चिम क्षितिज में होती है। ऐसी स्थिति तब होगी जब वृषभान्त राशि खमध्य में होगी क्योंकि खमध्य से ९०° पर क्षितिज वृत्त होता है। निश्चय ही उस समय क्रान्तिवृत्त का स्वरूप दृङ्मण्डल होता है तथा तदुपरि लम्ब रूप वृत्त क्षितिज ही होता है। अर्थात् ऐसी स्थिति में कदम्ब तारा भी क्षितिज में ही होती है। कदम्बाभिमुख शर कदम्ब से विक्षिप्त होने पर भी क्षितिज में ही रहेगा, नामन या उन्नामन उभय स्थितियों में ग्रह स्थान और ग्रह बिम्ब एक समयावच्छेदेन क्षितिज में उदित होकर दृश्य होते हैं। क्रान्ति वृत्त और ग्रहोदय लग्न ही यहां लग्न है। और आक्ष दृक्कर्म = आयन दृक्कर्म, परस्पर एक धन दूसरा ऋण (+ ४ - ४) = ० होने से दृक्कर्म = ० यह सही स्थिति क्रमज्या गणित से ही होती है। उत्क्रमज्या गणित से कदापि संभव नहीं है। यहाँ पर भिन्न दिशाओं के वलनों के होने से वलन का भी अभाव है। उत्क्रमज्या गणित से, जो साम्यता होनी चाहिए नहीं होती अतएव गणित गोल से उत्क्रमज्या प्रकार से वलनादि साधन सदोष है जो सुतरां त्याज्य भी है ॥१८।१९।२०।२१।२२॥ अथ तन्मतिभ्रमे कारणमाह— गर्वादिसराभ्यासात्परविश्वासात्प्रमादतश्चापि । मुह्यन्त्यपि मतिमन्तः किं मन्दोऽन्यैस्तथा चोक्तम् ॥२३॥ गणयन्ति नापशब्दं न वृत्तभङ्गं क्षयं न चार्थस्य । रसिकत्वेनाऽऽकुलिता वेश्यापतयः कुकवयश्च ॥२४॥ वा० भा०—स्पष्टम् ॥२३॥२४॥ इति श्रीभास्करीये गोलभाष्ये मिताक्षर उदयास्तदृक्कर्मवासना ॥ मरीचिः—अथोक्तैतद्दूषणरीतेविपरीतरीत्योत्क्रमज्यानीतायनवलने कल्पितं दूषणं ग्रहाधिकारोक्तं तत्र गणितनिरूपणे शिष्याणां गोलज्ञानाभावादुद्बोधमत्र प्रसङ्गाद्बोधार्थमनु- वदति । यत्खस्वस्तिकगे रवौ भवत्ये दृग्वृत्तसत्संस्थिते प्रत्यक्षं वलनं कुजे त्रिभयुतार्काग्रासमं दृश्यते । त्वं चेदुत्क्रमजीवयाऽऽनयसि तत्तावत्सखे गोलविन्मन्ये तर्ह्यमलं तदेव वलनं धीवृद्धि- दायोदितमिति । चन्द्रग्रहणाधिकारे व्याख्यातम् ॥२३॥ अथ द्वितीयं तदधिकारोक्तं दूषणं बोधार्थमत्र प्रसङ्गादनुवदति । यत्राऽऽक्षोऽङ्गरसा लवा दिनमणेस्तत्रोदयं गच्छतो मेषे वा वृषभेऽपि वाऽप्यनिमिषे कुम्भे स्थितस्यापि वा। स्पर्शी दक्षिणतस्तदा क्षितिजवत्सा क्रान्तिवृत्तं यतस्तद्वत्स्यादुत्क्रमजीवयाऽत्र वलनं व्यासार्ध- तुल्यं कथमिति । इदमपि तत्रैव व्याख्यातम् ॥२४॥ ननु यैरुत्क्रमज्ययोक्तं तैः किमाशयेनोक्तम् । न च भ्रान्त्या । सर्वत्र तथात्वापत्तेरित्यत