भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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शृङ्गोन्नतिवासना ४१९ रविदिक्तेन कारणेनेत्यर्थः । तेनेत्यस्य पुनरावृत्त्या सूर्येण । अनया स्वाभिमुखकर्णमार्गेणेत्यर्थः । शुक्लं स्वकिरणप्रतिफलनसंपादनेन चन्द्रगोले शुक्लरूपं दीयते । संपाद्यत इत्यर्थः । यद्यपि ब्रह्मगुप्तोक्तकर्णबिम्बस्यैतद्बिम्बान्तररूपत्वात्तदनुरोधेन चन्द्रसूर्यकरप्रतिफलनं युक्तमतः स्वाभि- मतकर्णस्य साक्षात्तदन्तरत्वाभावात्तदनुरोधेन शुक्लरूपमुक्तमसंगतं तथाऽपि तत्कर्णमार्गेण शुक्लदर्शनात्तथोक्तमिति ध्येयम् ॥५॥ केदारदत्तः—चन्द्रबिम्ब में शुक्लत्व और कृष्णत्व दर्शन का हेतु— अमृतमय चन्द्रबिम्ब, सूर्य की किरणों के सम्पर्क से सूर्याभिमुख चन्द्र बिम्ब आकाश में द्योतित (चमकीला) होता है । सूर्य की विपरीत दिशा में रमणीय रमणी के शिर में उत्पन्न श्याम वर्ण के केश समूह की श्यामल‌ता की तरह, सूर्याभिमुख धूप में स्थापित घट की तरह अर्थात् सूर्याभिमुख घड़े में घट की उज्ज्वलता, तथा घड़े की विरुद्ध दिशा में घट की श्यामल‌ता की तरह चन्द्रमा दिखाई देता है । सूर्य कक्षास्थ सूर्य से नीचे की चन्द्रकक्षा गत चन्द्रमा का आधा भाग दृश्टा के दृष्टियोग्य भाग दृश्य और १/२ भाग अदृश्य होता है । अमान्त काल में दृश्यभाग कृष्ण और अदृश्य भाग उज्ज्वल रहता है । तथा पूर्णान्त में सू० से चन्द्रमा ६ राशि आगे रहता है । प्रतिदिन सम्बन्धी सूर्य चन्द्र की गतियों के आधार से परिवर्त्तन रहने से प्रकाश मय १/२ चन्द्रमा दृश्य और १/२ भाग अदृश्य रहता है । यह सामान्य और स्थूल नियम है । सूर्य बिम्ब से चन्द्रबिम्ब जब भगण के चतुर्थांश से अन्तरित होता है तो नरदृष्टि से अर्द्धदृश्यमान चन्द्रमा का आधा बिम्ब शुक्ल का दृश्यमान होता है । जलज होने से जलमय चन्द्रबिम्ब में सूर्य से आगे होते होते शुक्लवृद्धि से शुक्लता और सूर्य समोपगमन में दृश्य चन्द्रबिम्ब में शुक्ल की हानि होती है । अत एव चन्द्र दर्शन शृङ्गाकार बिम्ब की तरह दीखता है क्योंकि सूर्य और चन्द्रमा दोनों बिम्बों का स्वरूप गोलाकार है । सूर्य चन्द्रमा का याम्य अन्तर = भुज = याम्योत्तर, तथा सूर्यचन्द्रमा का जो ऊर्ध्वाधर अन्तर = कोटि, भु² + को² = कर्ण² । कर्ण वर्ग का मूल = कर्ण । भुज मूल में सूर्य से चन्द्र दिशाऽभिमुख भुजाग्र से कोटि के अग्रभाग में चन्द्रमा को कर्ण मार्ग से सूर्य; सित = शुक्लाङ्गुल देता है ॥१-५॥ अथाध्यायोपसंहारश्लोकमाह— ईषदीषदिह मध्यमगादौ ग्रन्थगौरवभयेन मयोक्ता । वासना मतिमता सकलोह्या गोलबोध इदमेव फल हि ॥६॥ वा० भा०—हि यस्मात्कारणाद्गोले ज्ञात इदमेकं फलं यदश्रुताऽपि वासनोह्यते ॥६॥ इति श्रीभास्करीये सिद्धान्तशिरोमणिगोलभाष्ये मिताक्षरे शृङ्गोन्नतिवासनाध्यायः ।