भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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शृङ्गोन्नतिवासना ४१३ भू-पृष्ठ से आकाश दर्शन में आकाशीय कोई भी पदार्थ आधा से भी कम दिखाई देता है और वह भी गोलाकार दीखता है । क्षेत्र देखने से स्पष्ट हो रहा है । इति । वास्तव में दृष्टा और दृश्य बिम्बों में परस्पर की स्पर्श रेखाओं के अन्तर्गत दृश्य बिम्ब का आधे से अल्प बिम्ब दृश्य और आधे से अधिक बिम्ब सदा अदृश्य होता है । जैसे—स्प पृ स्प॑ = ३६०° – ( < पृ स्प के + < पृ स्प' के + < स्प के स्प स्प' इन तोनों कोणों का योग १८० अंश से अधिक है जिसे ३६०° में घटा देने से स्प पृ स्प दृश्य बिम्ब- कोण का मान १८०° से कम स्वतः सिद्ध है । इस प्रकरण को इसी ग्रन्थ के ग्रह गणिताध्याय के शृंगोन्नति अधिकार के पृ० २५६- सं० केदारदत्त जोशी कृत शिखा भाष्य उपपत्ति के साथ तथा गुरूणां गुरु श्री पं० सुधाकर द्विवेदी कृत वास्तव चन्द्रशृङ्गोन्नति ग्रन्थ अवश्य देखिये । ग्रन्थ विस्तार भय से यहाँ पर इस विषय का अधिक व्याख्यान अनावश्यक है । इति सिद्धान्त शिरोमणि ग्रहगोलाध्याय शृङ्गोन्नति अधिकार की पण्डित हरिदत्त ज्योतिर्विदात्मज पर्वतीय श्री केदारदत्तजोशी कृत “केदारदत्तः” सोपपत्तिक हिन्दी व्याख्यान सुसम्पन्न ।