सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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अपने में मिला लेती है, इत्यादि का वैज्ञानिक विषद् वर्णन है। इसी प्रसंग में नक्षत्र भ्रमण दोनों ध्रुवों की स्थिति के साथ योजन मान में पृथ्वी की परिधि, क्षेत्रफल, गोलफल घनफल गणित का प्रदर्शन, प्रलयकाल पृथ्वी की इयत्ता और प्रलयान्तर में उसकी कमी की मात्रा, ब्रह्माण्ड गोल वर्णन में आचार्य के स्वयं के मत के प्रतिपादन के साथ इस भुवकोषाध्याय का समापन हुआ है। यद्यपि ग्रहगणिताध्याय में इस प्रकार का विवेचन नहीं हुआ है। भुवनाकोषाध्याय में ब्रह्माण्ड गोल किसी नियत समय से, किसी नियत समय तक के अतिदीर्घ काल की ऐसी विचित्र संख्या ज्ञात की गयी है जिसे एक सृष्टि का आरम्भ और उसके विराम या विनाश के दीर्घकाल की अति विचित्र गणना के लम्बे आंकड़े पूर्वाचार्यों से ज्ञात हुये हैं उन्हें एक कल्प के सावन दिन कहते हैं या कल्प कुदिन (क० कु०) भी कहते हैं। सृष्टि के आरम्भ में सभी ग्रह मणिप्रोत माला में ग्रथित मणियों (माणिक्य या मोती या प्रवाल) की तरह जिस समय एक सूत्र में अपनी-अपनी कक्षाओं में एक बिन्दु पर दिखाई दिये उसे मेषादि बिन्दु कहा गया है। सात घोड़े विभिन्न गतियों से एक कालावच्छेदेन एक परिधि के एक बिन्दु से दौड़ शुरू किये और इस वृत्त परिधि के अनन्त अनेक चक्करों के साथ वह बड़े दीर्घ समय में गति शक्ति क्षीणता शून्यता से पुनः उस आदिम मेषादि बिन्दु पर पहुँच कर पुनः उतने ही समय तक विश्राम करने लगे। अर्थात् ब्रह्मा के एक दिन में हमारी यह मानव सृष्टि का प्रचलन और ब्रह्मा की एक रात्रि तक पुनः अन्धकार में होने से मानव सृष्टि का समापन हो गया। सूर्य सिद्धान्त के अनुसार मानव मान की दिन महायुग संख्या १५७७९१७८२८०००० और भास्कराचार्य के मत से १५७७९१६४५०००० में (ब्रह्मा का मात्र एक दिन और इतने ही की एक रात्रि) मानव सृष्टि का आरम्भ और सृष्टि का अन्त हो जाता है। सूर्य सिद्धान्त के कल्प कुदिनों से भास्कराचार्य के कल्प कुदिनों की संख्या कम है। जो सूक्ष्म है क्योंकि भास्कराचार्य ने सूर्य सिद्धान्त को आगम प्रामाण्य मानते हुए भी उसके गणित-स्थूलता को समय-समय पर ठीक कर गणितज्ञों से सूक्ष्म गणिताभिमुख (समय-समय पर) होने का भी आदेश दिया है। दोनों का अन्तर सम्बन्धी सूर्य सिद्धान्त का एक वर्ष सम्बन्धी कालमान भास्कराचार्य से अधिक और आधुनिक बेधगणित से और कुछ अधिक होता है। तात्पर्य है कि श्री भास्कराचार्य का भी दृढ़ मत है कि समय-समय पर ग्रह वेध से गणितागत ग्रह का साम्य जिस गणित संस्कारों से हो यहाँ देने चाहिए। उक्त एक ब्रह्म दिन में अश्विनी.........रेवत्यन्त नक्षत्रों की अपनी कक्षागत भ्रमण करने के आंकड़े नक्षत्र भ्रमण = भ भ्रमण अर्थात् नक्षत्र का भ्रमण = चक्कर भ्रमण शब्द से व्यवहार में जाना गया है।