सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४४ ) सरोवर जैसे शोभाहीन हैं, परदेश गए हुये पति के अभाव से सुशील सुन्दर शोभाहीन नववधू की तरह सिद्धान्त ज्ञान गणित रहित ज्योतिषी भी विद्वत्सभा में उपहास का पात्र हो जाता है । इत्यादि आचार्य भास्कर ने दोनों भागों में उक्त विषय प्रतिपादित किया है । २. गोलस्वरूपप्रश्नाध्याय — ग्रहगोलाध्याय के गोलस्वरूपप्रश्नाध्याय में सर्वप्रथम भूस्थान (पृथ्वी की स्थिति), ग्रहों का स्पष्टीकरण, देशांतर, उदयांतर, भुजांतर और चरांतर ग्रहों के उच्चनीच, पात-महापात (महान अंधकार, स्थान राहु और केतु) ग्रह केन्द्र आकर्षण बिन्दु से मन्दफल, शीघ्रफल, ग्रहों के उदयास्तादि अनेक गणित जन्य कर्म, भूमध्य रेख. से उत्तर-दक्षिण के भूपृष्ठीय देशों में दिनरातिमान की ह्रास वृद्धि का कारण, एक सौर वर्ष की दिन संख्या दिनादि (जो सूर्य सिद्धान्त से ३६५।१५।३१।३० एवं भास्कराचार्य के मत से ३६५।१५।३०।२२।३० के तुल्य है सभी विषयों का विशद व्याख्यान किया गया है जो ग्रन्थ में प्रत्यक्ष है कि भास्कराचार्य का वर्षमान वेधगणित साध्य सूर्य सिद्धान्त से सूक्ष्म है), देव स्थानीय देवताओं का एक दिन, भूपृष्ठीय मानव मान के एक चान्द्रमास तुल्य तीस तिथियों में चन्द्रमा के ऊपर पृष्ठस्थित पितृलोकवासियों का एक ही दिन होने के कारण, तथा मानव मान के १५७७९१७७२८ दिनों अर्थात् १००० मानव महायुगों में ब्रह्मा का मात्र एक ही दिन और इतने ही आँकड़ों में एक रात्रि होने का कारण, खगोलीय परिभाषित शब्दों के अनुसार दिज्या, कुज्या, क्रांति, समशंकु, अक्षांश, लम्बांश आदि की गोल में कहाँ कैसी स्थिति ? पूर्णान्त काल में चन्द्रग्रहण होता है तो अमान्त काल में सूर्यग्रहण का मध्यकाल क्यों नहीं ? चन्द्रग्रहण का चन्द्र बिम्ब में पूर्व में स्पर्श, पश्चिम में मोक्ष तो सूर्यग्रहण में सूर्य स्पर्श और मोक्ष में वैपरीत्य क्यों ? भूगर्भकेन्द्राभिप्रायिक ग्रहों की अदृश्यता की दृश्यता के लिए भूपृष्ठाभिप्रायिक ग्रह साधन ग्रह गणित का कारण आदि अनेक प्रश्नों, उदाहरणों से विभूषित गोलस्वरूपप्रश्नाध्याय आज तक ख्यात नाम है । गोलाध्याय के इस गोलस्वरूपप्रश्नाध्याय के अतिरिक्त इन बातों का विस्तारपूर्वक वर्णन महाप्रश्न अध्याय में मिलता है । ग्रहगणिताध्याय में इस प्रकार का विशद् वर्णन नहीं है । ३. भुवनकोषाध्याय—गोलाध्याय के भुवनकोषाध्याय में पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश पंच सूक्ष्म स्थूल तत्वों से पृथ्वी के निर्माण में वेद, वेदान्त, सांख्य आदि दर्शनशास्त्रों के साथ पृथ्वी का चन्द्र, बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, बृहस्पति तदुपरि अनेक ताराओं से आवृत्त भूस्वरूप वर्णन के साथ आधार रहित पृथ्वी अपनी शक्ति विशेष से यथास्थान स्थित अष्ट मूर्ति सर्वशक्तिमान भगवान शंकर की एक अचल प्रतिमा पृथ्वी है इस कथन के साथ पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है जो अपने वायुमण्डल के गुरू पदार्थ को