सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयन्त्राध्यायः ४२१ यह अंकन प्रकार आचार्य ने सर्वतोभद्र चक्र में दिया है उसे उपलब्ध कर देखना चाहिए । आचार्य ने यही सर्वतोभद्रस्थ अंकन प्रकार इस जगह पर शिष्यों की सहूलियत के लिये यहाँ भी उक्त वासना भाष्य में दे दिया है । ३६० अंशों से अङ्कित वृत्त की परिधि में स्वदेशोदय का चिह्न कर प्रत्येक स्वोदय का क्षेत्रादि राशि मान ३०° में १०-१० अंश के द्रेष्काण, २°।३० द्वादशांश, ३°।२० से नवमांश १५° मान से होरा का चिह्न, और उन उन लग्न होरा द्रेष्काण द्वादशांश राशियों के अधिपति ग्रहों का नाम इत्यादि षड्वर्ग विभाजन पूर्वक चक्र निर्माण करना चाहिए । इस प्रकार कालज्ञान बोधक यन्त्र के निर्माण पूर्वक जिस दिन उक्त यन्त्र से कालज्ञान अपेक्षित हो उस दिन उदय काल में स्पष्ट सूर्य की राश्यादिकों को मेषादि से चिह्नित कर सूर्य की वर्तमान राशि के अंशों को चक्रस्थ राशि भागों में चिह्नित कर आगे स्पष्ट रवि का भी चिह्न अङ्कित करना चाहिए । उस दिन उदयादि प्राक्कालीन यष्टि की छाया जो पश्चिम दिशा की अभिमुखी है, उस छाया यन्त्र में स्थापित स्पष्ट सूर्य की छाया जैसे लगे उस प्रकार यन्त्र को स्थिर करना चाहिए । उस स्थिति में सूर्य क्षितिज से जैसे जैसे ऊपर जावेगा तो निश्चित है कि प्रकाश की विरुद्ध दिशा गमनशीला छाया नीचे नीचे जावेगी । अतः छाया ओर रवि चिह्न के मध्य में यन्त्रगत पाली में जितनी घटिका होती हैं वहो दिनगत घटिका सुस्पष्ट होती हैं । सूर्योदय बिंदु से सूर्य बिम्ब तक प्रसिद्ध सूर्योद- यादिष्टकाल हो जाता है। तथा यष्टि छाया में जो राशि और होरा द्रेष्काणादि हों उन उनराशियों एवं राशीश ग्रहों आदिकों से षड्वर्ग ज्ञान करना चाहिए । अथवा चक्र के भीतर इष्ट प्रमाण के कीलक (शङ्कु) को ध्रुवाभि मुख जैसे हो तैसे स्थापित कर किसी प्रकार किसी आधार से चक्र को स्थिर करने से इष्ट काल में कीलक की छाया जहां लगती है वहाँ से ओर यन्त्र के अधस्तन चिह्न तक नत घटिका होती हैं । इसी का नाम नाडीवलय है । उपपत्ति—याम्योत्तर वृत्तस्थ सूर्य की छाया नीचे होगी, वहाँ पर नतकाल का अभाव है । अभीष्ट समय में कील की छाया और यन्त्र तल के मध्य में नतघटिका होती हैं । उपपन्न होता है ॥७॥