सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४७ ) प्रवह वायुमण्डल में कोई भी ग्रह पिण्ड नित्य पश्चिम गति से पृथिवी के चक्कर लगाने से नित्य वह वस्तु २४ घण्टे में = ६० घटो में अपने क्षितिज में उदित देखी जाती है। अतः नक्षत्रों, ग्रहों के साथ यह राशि चक्र नित्य प्रवह वायु वेग से पश्चिम की ओर घूमकर पुनः २४ घण्टे = ६० घटी में जिस जस जगह से चली थी उसी जगह पर आ जाती है। प्रवह वायुमण्डल में स्थित कोई भी नक्षत्र नित्य आज जिस समय आकाश में जिस बिन्दु पर दिखाई देता है वह काल या समय ठीक ६० घटी = २४ घण्टे में पुनः उसी जगह पर दिखाई देता है। इससे स्पष्ट है कि कोई भी नक्षत्र स्वयं की अपनी गति से शून्य है। वह नक्षत्र प्रवह वायु की पश्चिम की गति के आधीन है किन्तु कुछ ऐसे भी ग्रह पिण्ड हैं जो प्रवह वायु वेग से पश्चिम जाते हुए अपनी गति से नक्षत्र चक्रस्थ नक्षत्र वृत्त या राशिवृत्त में नित्यपूर्व की ओर जाते रहते हैं। (कृपया इस सन्दर्भ में इसी ग्रन्थ का चित्र सहित केदारदत्त व्याख्यान पृष्ठ १२५-१३० तक देखिये ।) तथा सौर, सावन, चान्द्र, नाक्षत्र, दिनों के साथ सौरमास, चान्द्रमास, अधिकमास, वर्ष आदि अनेक विषयों में इस अधिकार में गोल खगोल की दृष्टि से उपपत्ति के साथ विवेचन के साथ मध्यम गति वासना का समापन हुआ है। ग्रहगणिताध्याय में यही विषय कल्प से लेकर कल्पान्त तक सूर्य, चन्द्र में ग्रहों की पात उच्च इष्ट समय में गणित ग्रहों का सावन, कल्प कुदिन के सौर, सावन, चान्द्र नाक्षत्र, बार्हस्पत्य आदिकों की दिन संख्या, नाक्षत्र दिन संख्या, कल्प कुदिन संख्या, अधिमास अवमशेष का ज्ञान, सूर्य चन्द्र साधन गणित, वर्षेष ज्ञान के साथ प्रत्यव्ध शुद्धि, कल्प के आरम्भ दिन से वर्तमान सौर वर्ष के अभीष्ट मास, अभीष्ट अंश के अभीष्ट वार तक की दिन गणना (अहर्गण साधन) का ज्ञान, अहर्गण ज्ञान से अभीष्ट दिन सम्बन्धी मध्यम-मानीय ग्रहों का साधन, देशान्तर साधन, बीजकर्म गणित, मध्यम भूपरिधि और स्पष्ट स्वदेशीय भूपरिधि साधन गणित से मध्यमाधिकार का समापन हुआ है। ५-६. छेद्यकाधिकार व ज्योत्पत्ति वासना अध्याय—मध्यम गति वासनाधिकार के पश्चात् गोलाध्याय में छेद्यक-अधिकार नामक अधिकार में गोलरचना, गोल परि- भाषा आदि के साथ सर्वप्रथम ज्योत्पत्ति का वर्णन किया है। किसी वस्त्र के निर्माण में उस वस्त्र के सूक्ष्म तन्तुओं सूत्रों का निर्माण आवश्यक होता है। वस्त्र के सूक्ष्म तत्वों से सूत्र ज्ञान के और सूत्र निर्माण के अनन्तर वस्त्र निर्माण आवश्यक होता है। उसी प्रकार ग्रहगोल खगोल ज्ञान के लिए अनन्त वृत्तों की अनन्त परिधियों की एक धरातल में समझकर परिधि खण्डों की वक्रात्मक रेखाओं के सरल रेखाओं को गणित से साधन करते हुए परिधि खण्डों का नाम चाप और उनकी सरल रेखाओं का नाम ज्या कहा गया है। परिधि खण्ड का चतुर्थांश ९०° की सरलाकार रेखा का नाम त्रिज्या कहकर