भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( ४८ ) ज्या और चाप के अनेक विध गणितों में ज्या, कोटि ज्या, स्पर्श, कोटि स्पर्श, छेदन, कोटिछेदन, उत्क्रम और कोट्युत्क्रम रेखाओं के सामञ्जस्य का गणित का नामकरण आचार्य ने “ज्योत्पत्ति” गणित नामकरण करते हुये ज्योत्पत्ति प्रकरण को समझाया है जो आधुनिक विकसित गणित में त्रैकोणमिति आदि नाम से प्रसिद्ध है । गणिताध्याय के स्पष्टाधिकार में मध्यम ग्रह से स्पष्ट ग्रह साधन के अनेक गणितों का जो उपयोग हुआ है उसी तरह गोलाध्याय के छेद्यकाधिकार में मध्यम ग्रहों को स्पष्ट करने ग्रहगोलीय अनेक युक्तियों का व्याख्यान और उनकी उपपत्ति ज्ञान के साथ छेद्याधिकार का समापन हुआ है । ७. गोलबन्धाधिकार—ग्रहगोलाध्याय के गोलबन्धाधिकार प्रकरण के आरम्भ में सुन्दर, सरल, सुदृढ़ बाँस शलाकाओं से गोल रचना के साथ ग्रहगोल भगोल का एक स्वरूप (माडल) बनाया जाना बताया गया है । विषवत्, पूर्वापर, कोण, याम्योत्तर क्षितिज, निरक्ष क्षितिज (उन्मण्डल) वृत्तों की अभीष्ट त्रिज्या (एक हाथ या दो हाथ की या यथेष्ठ मान के व्यासार्ध) से अनेक वृत्तों की रचना का एक गोल में परस्पर बन्धन करके गोल रचना करना चाहिये कहा गया है । गोल में सूर्य, चन्द्र, मंगलादि अनेक ग्रहों के भ्रमण वृत्तों का पारस्परिक पूर्वापर, ऊर्ध्वाधर, याम्योत्तरादि अनेक अनंत कक्षायें समझकर पूर्वापर, क्रांतिवृत्त, नाड़ीवृत्त और ग्रह भ्रमण विमण्डल वृत्तों के याम्यो- तरान्तरादि स्थिति से क्रान्ति, शर को जो कि शिष्य वर्ग को स्पष्ट समझा सकें और इसी आधार से अनन्त ब्रह्माण्ड की अनन्तता का विचार कर सकें इत्यादि से आचार्य ने गोलबन्धाधिकार का समापन किया है । ग्रहगणिताध्याय की अपेक्षा ग्रहगोलाध्याय में यह प्रकरण सविशेष है । ग्रहगणिताध्याय में स्पष्टाधिकार के पश्चात् त्रिप्रश्नाधिकार का प्रारम्भ हुआ है, जबकि ग्रहगोलाध्याय में त्रिप्रश्नाधिकार जैसे महत्व के विषय को समझने के लिए गोलबन्धाधिकार प्रकरण की रचना आचार्य ने की है । सिद्धांत ग्रन्थों के अध्ययन के लिए यह गोलबन्धाधिकार सर्वोपरि विषय है और अधिक शब्दों में यह कहा जा सकता है कि गोल रचना, गोलज्ञान सिद्धान्त ज्योतिष की आधारशिला है । तीक्ष्ण बुद्धि के सुयोग्य ग्रह-गणित ज्ञान पिपासु छात्र के लिए ग्रहसिद्धान्त में प्रवेश हेतु गुरु द्वारा गोलबन्धन ज्ञान प्राप्ति अति अनिवार्य है । ऐसा आचार्यों का दृढ़ शब्दों में आदेश है । श्री भास्कराचार्य कृत सिद्धान्तशिरोमणि ग्रहगोलाध्याय नामक यह ग्रन्थ ग्रहगणित खगोल से सम्बन्धित है । अतः विद्यार्थियों एवं विज्ञ पाठकों के लाभार्थ संक्षेप से खगोल परिभाषा परिचय के साथ प्रथमतः भूमण्डल में मेरु पर्वत की स्थिति की यथार्थता का क्षेत्रदर्शन पूर्वक सही विचार नीचे दिया जा रहा है । आशा है इस सही विषय को समझकर विद्वान लोग मेरु पर्वत विषयक विवाद से बचेंगे ।