भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

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( ४९ ) "मेरु पर्वत कहाँ है ? किसे मेरु पर्वत माना जाय ?" एवं ग्रहादयः सर्वे भगणाद्या यथाक्रमम् । अन्तर्बहिविभागेन कालचक्रे नियोजिताः ॥ देवी भागवत स्क० ८ अध्या० १७ केतुमालाख्यभद्राश्वपाश्वयोः प्रथितौ च तौ । मन्दरश्च तथा मेरुः मन्दरश्च सुपाश्वंकः ॥ स्क० ८ अ० ६ श्लोक १६, १७, कुमुदश्चेति विख्याता गिरिशः मेरुपादकाः । योजनायुतविस्तारोन्नाहा मेरोश्चतुर्दिशम् ॥ तथा गीता के अध्या १० में "वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्" अर्थात् भगवान् ने पर्वतों में अपने को मेरु अर्थात् ध्रुव कहा है। भगवान् के श्री मुख से मेरु के उच्चारण से सर्वोपरि पृथ्वी में मेरु स्थान वही है जिसके ठीक शिर या स्वखमध्य में ध्रुव तारा हो। वही सूर्यसिद्धान्त के अनुसार "सर्वेषामुत्तरतो मेरुः" वचन से सुमेरु अर्थात् शीर्षगत ध्रुववेध से दिक्साधन में वास्तव उत्तर दिशा का ज्ञान समीचीन कहा गया है। मध्याह्न कालिक सबसे छोटी छाया को वर्द्धित कर उसके केन्द्र के ऊपर लम्ब रूप रेखा से (पूरब पश्चिम) सूक्ष्म पूर्वापर दिशा का ज्ञान होता है। उत्तर बिन्दु मेरु या सुमेरु एवं दक्षिण बिन्दु, दक्षिण ध्रुव या राक्षस स्थान कहा गया है। इस प्रकार आए दिन मेरु पर्वत पर मुझे अनेक शोध लेख पढ़ने व सुनने में मिले जिन्हें पढ़कर मेरी बुद्धि संशय रहित नहीं हो सकी क्योंकि विषुवद्वृत्त भूमध्य पूर्वापर रेखात्मक वृत्त का पृष्ठीय केन्द्र बिन्दु ध्रुव है। पृथ्वी की सर्वाधिक गोलाई की परिधि भूमध्य धरातल पर होती है। यदि हम अपने स्थान, जैसे काशी पृष्ठीय धरातलीय भूपरिधि का मान जानना चाहेंगे तो नीचे क्षेत्र दर्शन से-- [चित्र: आकाश में उत्तर ध्रुव स्थान पृथ्वी में उत्तर ध्रुव स्थान काशी या स्वदेश की भूपरिधि या मेरु स्थान परम अधिक भूपरिधि पृथ्वी में दक्षिण ध्रुव स्थान या कुमेरु स्थान आकाश में दक्षिण ध्रुव स्थान] ४