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सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

( ४९ ) "मेरु पर्वत कहाँ है ? किसे मेरु पर्वत माना जाय ?" एवं ग्रहादयः सर्वे भगणाद्या यथाक्रमम् । अन्तर्बहिविभागेन कालचक्रे नियोजिताः ॥ देवी भागवत स्क० ८ अध्या० १७ केतुमालाख्यभद्राश्वपाश्वयोः प्रथितौ च तौ । मन्दरश्च तथा मेरुः मन्दरश्च सुपाश्वंकः ॥ स्क० ८ अ० ६ श्लोक १६, १७, कुमुदश्चेति विख्याता गिरिशः मेरुपादकाः । योजनायुतविस्तारोन्नाहा मेरोश्चतुर्दिशम् ॥ तथा गीता के अध्या १० में "वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्" अर्थात् भगवान् ने पर्वतों में अपने को मेरु अर्थात् ध्रुव कहा है। भगवान् के श्री मुख से मेरु के उच्चारण से सर्वोपरि पृथ्वी में मेरु स्थान वही है जिसके ठीक शिर या स्वखमध्य में ध्रुव तारा हो। वही सूर्यसिद्धान्त के अनुसार "सर्वेषामुत्तरतो मेरुः" वचन से सुमेरु अर्थात् शीर्षगत ध्रुववेध से दिक्साधन में वास्तव उत्तर दिशा का ज्ञान समीचीन कहा गया है। मध्याह्न कालिक सबसे छोटी छाया को वर्द्धित कर उसके केन्द्र के ऊपर लम्ब रूप रेखा से (पूरब पश्चिम) सूक्ष्म पूर्वापर दिशा का ज्ञान होता है। उत्तर बिन्दु मेरु या सुमेरु एवं दक्षिण बिन्दु, दक्षिण ध्रुव या राक्षस स्थान कहा गया है। इस प्रकार आए दिन मेरु पर्वत पर मुझे अनेक शोध लेख पढ़ने व सुनने में मिले जिन्हें पढ़कर मेरी बुद्धि संशय रहित नहीं हो सकी क्योंकि विषुवद्वृत्त भूमध्य पूर्वापर रेखात्मक वृत्त का पृष्ठीय केन्द्र बिन्दु ध्रुव है। पृथ्वी की सर्वाधिक गोलाई की परिधि भूमध्य धरातल पर होती है। यदि हम अपने स्थान, जैसे काशी पृष्ठीय धरातलीय भूपरिधि का मान जानना चाहेंगे तो नीचे क्षेत्र दर्शन से-- [चित्र: आकाश में उत्तर ध्रुव स्थान पृथ्वी में उत्तर ध्रुव स्थान काशी या स्वदेश की भूपरिधि या मेरु स्थान परम अधिक भूपरिधि पृथ्वी में दक्षिण ध्रुव स्थान या कुमेरु स्थान आकाश में दक्षिण ध्रुव स्थान] ४

( ५० ) ९० - अक्षांश = लम्बांश । अर्थात् ९० - काशी के अक्षांश = ९०° - २५/१८ = ६४/४२ इसकी ज्या का नाम अपने देशीय परिधि की त्रिज्या = स्पष्ट भूपरिधि व्यासार्द्ध होता है । जिसे लम्बांशज्या या लम्बज्या भी कहते हैं, या अपने देश की स्पष्ट भूपरिधि व्यासार्द्ध भी कहते हैं । अतः अनुपात से भू० प० × ज्यालं ───────────── = स्पष्ट भूपरिधि भूव्यार्द्ध परम भूपरिधि × ज्यालं ───────────────────── = अपने देशीय भूपरिधि व्यास परमाधिक भूव्यासार्ध त्रि उत्थापन देने से भूपरिधि × भूव्यार्द्ध × ज्यालं भूपरिधि × ज्यालं ───────────────────────── = ───────────────── त्रि × भूव्यार्द्ध त्रि गणित से ही स्पष्ट भूपरिधि, मेरु = ध्रुव कहने से सही है । इसी लिए सूर्य सिद्धान्त में राक्षसालयदेवौकः शैलयोर्मध्यसूत्रगाः । रोहीतकमवन्तीच तथा सन्निहितं सरः ॥ देवानामोको वासस्थानरूपः शैलः, पर्वतः मेरुः···ध्रुव इति स्पष्ट है । भास्कराचार्य ने भी— “भूर्लोकारण्यौ दक्षिणे व्यक्षदेशात्, तस्मात् सौम्योऽयं भुवः स्वश्च मेरुः” तथा— “यल्लङ्कोज्जयिनीपुरोपरिकुरुक्षेत्रादिदेशान्स्पृशत् । सूत्रं मेरुगतं बुधैर्निगदिता सा मध्यरेखा भुवः ॥···से स्पष्ट किया है कि ध्रुव स्थान का अपर नाम ही मेरु है । ६६° अंश से अधिक अक्षांशीय देशों में लम्बांशाधिक सूर्य क्रान्ति समय तक सदा दिन ही होगा, तथा एवं उत्तर ध्रुव में ६ महीने के दिन २३ मार्च से २३ सेप्टेम्बर तक तथा इस बीच दक्षिण ध्रुव में ६ महीने की रात्रि होती है । (आधुनिक अयनांश से ।) “मेरौ रविर्भ्रमति भू जगतः समन्तादाशा न काचिदपि तत्र विचारणीया” इत्यादि मेरु स्थान में क्षितिज के जिस बिन्दु पर सूर्योदय होता है हमारे मान के ६ महीने की दिन माप से उसी सूर्य के उदित बिन्दु पर सूर्य का अस्त भी देवता लोग देखते हैं । अर्थात् मेरु स्थान में पूर्व पश्चिम दिशा पृथक् नहीं एक ही होती है । दिशा ज्ञान मेरु अर्थात् ध्रुव में नहीं होता है इसलिए भू पृष्ठ पर मेरु का अपर नाम ध्रुव बिन्दु स्पष्ट है ।

( ५१ ) इसी प्रसंग में इसी प्रकार सर्व साधारण के समझने के लिए ग्रह गणित गोल की कुछ परिभाषाएँ तथा संक्षेप से आवश्यक पारिभाषिक शब्दों का परिचय निम्न भाँति दे देना आवश्यक है क्योंकि इस गोल-बन्धाधिकार से ही निम्न विषय सविशेष सम्बन्धित हैं । १. किसी भी खगोलीय वृत के तीन केन्द्र होते हैं । एक गर्भीय केन्द्र और दो पृष्ठीय केन्द्र होते हैं । २. पृष्ठीय केन्द्रों से ९० अंश के तुल्य चाप से वृहद्वृत्त बनते हैं । नब्बे अंश से कम दूरी के बनाये गये वृत्तों को लघुवृत्त कहते हैं । नियत एक केन्द्र के बृहद्वृत्त और लघुवृत्त परस्पर समानान्तर भी होते हैं । जैसे नाड़ीवृत्त (Equator) का समानान्तर (Parallal of Latitude) वृत्त अहोरात्र वृत्त (Diurnal Circle) है । ३. पृथ्वी के गोल केन्द्र से ध्रुव की तरफ वर्द्धित रेखा जहाँ पृथ्वी पृष्ठ में लगती समझी जाती है वहीं पर पृथ्वी में ध्रुव बिन्दु है । उत्तर की ओर उत्तर ध्रुव अर्थात् ध्रुव निष्ठ. बिन्दु देवताओं के लिए वास्तविक ध्रुव तारा उनके शिर पर आकाश में खमध्य में होती है । इसी प्रकार दक्षिण ध्रुव पृष्ठ में बसने वालों के लिए दक्षिण ध्रुव, आकाश में उनके शिर के ऊपर दीखेगा । इसी ध्रुव की मेरु पर्वत संज्ञा खगोलज्ञ शास्त्रकारों ने की है । ४. अपने स्थान से आकाश में अपने शिर के ऊपर खमध्य आकाश मध्य (Zenith) बिन्दु है । ठीक अपने खमध्य से १८०° की दूरी पर अधः खमध्य (Nadir) है । अपने दोनों खमध्यों और दोनों ध्रुवों पर गये हुये वृत्त का नाम याम्योत्तर वृत्त (Meridian Circle) है । ५. ध्रुव से (Pole Star) नब्बे अंश की दूरी पर नाड़ीवृत्त (Equatar Circle) होता है । यहाँ पर अक्षांश (Latitude) शून्य होता है । ६. नाड़ीवृत्त (Equator) और याम्योत्तर वृत्त (Meridian Circle) के सम्पात (Node) बिन्दु का नाम निरक्ष खमध्य होता है । ७. निरक्ष खमध्य से नब्बे अंश चाप की दूरी पर से बनाये गये वृत्त (Circle) को उन्मण्डल (Six O' Clock Circle) वृत्त कहते हैं । ८ अपने खमध्य (Zenith) से नब्बे अंश चाप की दूरी से जो वृत्त बनता है उसे क्षितिज (Horizon) वृत्त कहते हैं । ९. अपने क्षितिज (Horizon) वृत्त और याम्योत्तर वृत्त (Meridian Circle) के सम्पात बिन्दु का नाम समस्थान (Connecting Point) है । यह समस्थान बिन्दु पूर्वापर (Prime Vertical Circle) वृत्त का पृष्ठीय केन्द्र है । १०. समस्थान और ध्रुवस्थान (Pole Star Pace) का याम्योत्तर वृत्तीय (Meri- dion Circle) अन्तर चाप का नाम अपना स्वमध्य (Zenith) और निरक्ष खमध्य का का याम्योत्तर वृत्तीय अन्तर चाप का नाम अक्षांश (Latitude, Terrestril Axis) है ।

( ५२ ) ११. ध्रुव स्थान (Pole Star) और स्वखमध्य (Zenith) का याम्योत्तर वृत्तीय अन्तर चाप का नाम लम्बांस (९०°-अक्षांश) है । १२. दोनों समस्थान चिह्नों से ४५° पेंतालिस अंश पूरब और पश्चिम की तरफ की दूरी पर अपने क्षितिज (Horizon) वृत्तीय बिन्दु पर और दोनों खस्वस्तिक और अधः स्वस्तिक (Zenith and Nadir) बिन्दुओं पर गये वृत्तों के नाम कोणवृत्त हैं । (१) ईशान (North East) से नैऋत्य (South West) तक कोण वृत्त है । (२) वायव्य से (North West) अग्नि कोण (South East) तक गया हुआ होता है । इन्हें विदिग्वृत्त भी कहते हैं । १३ नाडीवृत्त (Equator Circle) अपना पूर्वापर वृत्त (Prine Vertical Circle) उन्मण्डल (Six O' Glock Circle) और क्षितिज (Horizon) वृत्तों के पृष्ठीय केन्द्र (Center) याम्योत्तर वृत्त में (Meridian Circle) में होते हैं । इसलिए याम्योत्तर वृत्त के पृष्ठीय केन्द्र पूर्व स्वस्तिक बिन्दु पर चारों वृत्त का सम्पात (Connecting Point) बिन्दु का गोल में, पूर्वस्वस्तिक नाम है । १४. आकाशस्थ ग्रह बिम्ब के गर्भ केन्द्र और दोनों खमध्यों (Zenith and Nadir) पर गये हुए वृत्त का नाम दृग्वृत्त (Verticalcircle) है । इस दृग्वृत्त में खमध्य (Zenith) से ग्रह बिम्ब तक नतांश (Zenithdistarce) तथा क्षितिज से (Horizon) ग्रह (Planet) बिम्ब तक उन्नतांश (Altitude) तथा नतांश को ज्या दृग्ज्या एवं उन्नतांश की ज्या शंकु होती है । १५. ध्रुव स्थान से २४° चौबीस अंश चाप की दूरी पर कदम्ब भ्रमवृत्त में कदम्ब तारा (Pole of the Ecliptic) रहती है । कदम्ब को केन्द्र मानकर नब्बे अंश की दूरी के चाप से जो वृत्त बनेगा उसे क्रान्ति वृत्त (Ecliptic or Orbit) कहते हैं । १६. इसी प्रकार कदम्ब से शर चाप की दूरी पर (चन्द्रमा आदिक ग्रह जिस वृत्त में अपनी गतियों से चलकर राशि चक्र की परिक्रमा करते हैं उस मार्ग का नाम विमण्डल हैं ।) विमण्डल वृत्त का पृष्ठीय केन्द्र विक्षेपवम्ब होता है । यथा चन्द्र भ्रमण मार्ग का नाम चन्द्र विमण्डल होता है । इसी प्रकार और ग्रहों का भी विमण्डल होता है । १७. नाडी (Equator) वृत्त और क्रान्ति वृत्त (Ecliptic or Orbit) के सम्पात बिन्दु का नाम गोल संधि (Node of an Orbit) या क्रान्ति पात है । इन दो बड़े वृत्तों के इन दो सम्पातों में एक सम्पात का नाम सायन मेषादि (वसन्त-सम्पात) (Ascending node of the Equator) (First Point of Aples, Vernal Equinox) और दूसरे सम्पात का नाम सायन तुलादि (Descending node of the Equator first Point of Libra, Aatumnal Equinox) कहा जाता है ।

( ५३ ) १८. इन सम्पातों में किसी एक केन्द्र से (Centre of a Circle) नब्बे अंश चाप की दूरी पर बने हुए वृत्त का नाम अयन प्रोतवृत्त (Solstitial Colour Lircle) है। १९. मेष से कन्या तक ६ राशि उत्तर गोलार्द्ध (Northarn Hemis Phere) में, तुला से मीन तक ६ राशियाँ दक्षिण गोलार्द्ध (Southern Hemis Phere) में होती है । २०. उक्त उसी प्रकार कर्क से धनु राशि तक उत्तर अयन एवं मकर से ६ राशि मिथुन तक दक्षिण अयन सन्धि (Solsfitial Point) होती है । २१. क्रान्ति वृत्त और विवृत्त के योग बिन्दु का नाम क्रान्तिपात (Equinoctial Point) है। इसी को सूर्य चन्द्र ग्रहण का कारणीभूत राहु (Ascending Node of the Moon's Orbit) कहते हैं । २२. किसी भी अभीष्ट समय में क्रान्ति वृत्त का जो प्रदेश बिन्दु उदय क्षितिज (Horizon) में लगा रहता है उसे उदय लग्न और अस्तक्षितिजीय बिन्दु को अस्त लग्न कहते हैं । २३. जिन-जिन बिन्दुओं में कोई महद्वृत्त किया जाता है उन्हीं बिन्दुओं के नाम से उस महद्वृत्त को वही बिन्दुप्रोत नाम दिया जाता है। जैसे—दोनों ध्रुवों से इष्ट स्थान पर किये गये वृत्त का नाम ध्रुवप्रोत वृत्त एवं दोनों समस्थानों और ग्रह बिम्ब पर गये वृत्त का नाम समप्रोतवृत कहा जाता है। २४ नाडीवृत्त से ग्रह बिम्ब तक ध्रुवप्रोत वृत्त में क्रान्ति (Declination) चाप होता है। क्रान्ति चाप को ९० में घटाने से शेष का नाम द्युज्या चाप होता है। ध्रुव बिन्दु को केन्द्र (Centre of Circle) मान कर द्युज्या चाप तुल्य व्यासार्ध से रचित वृत्त (Circle) का नाम अहोरात्र वृत्त (Diurnal Circle) है। २५ ग्रह बिम्ब के केन्द्र में होते हुए कदम्बप्रोतवृत्त जहाँ पर क्रान्तिवृत्त के साथ सम्पात करता है, उस सम्पात बिन्दु से ग्रह बिम्ब तक कदम्बप्रोत वृत्त में ग्रह का शर (Celestial Latitude) होता है। यह बिम्बीय स्थानीय अहोरात्र वृत्तों का अन्तर हैं, जिसमें ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति ज्ञात होती है । २६. क्षितिज और अहोरात्र वृत्त के सम्पात के ऊपर किया गया ध्रुव प्रोत वृत्त जहाँ पर नाडी वृत्त के साथ सम्पात करता है उस सम्पात बिन्दु से पूर्व स्वस्तिक बिन्दु तक चर काल होता है । इसके अहोरात्र वृत्तीय लघु स्वरूप का नाम कुज्या है । २७ ग्रह बिम्ब से पूर्वापर वृत्त तक समप्रतोदृत में भुजांश चाप है। भुजांश चाप को नब्बे में कम करने से शेष का नाम उपवृत्त व्यास होता है। भुजांश चाप की ज्या नलिका वेध के समय भुज संज्ञक है ।

( ५४ ) २८. गोल सन्धि से ग्रह बिम्बीय स्थान तक क्रांति वृत्तीय चाप का नाम भुजांश चाप है, जो चापीय क्षेत्र का कर्ण है, तथा गोल सन्धि से ग्रह बिम्ब के ऊपर गये हुए ध्रुव प्रोत वृत्त का क्रान्तिवृत्तीय ग्रह स्थान तक भुजांश कर्ण, एवं नाड़ीवृत्तीय स्थान तक विषु- बांश कोटि, एवं ध्रुव प्रोतवृत्त में ग्रह की क्रान्ति-भुज, यह एक प्रसिद्ध चापीय क्षेत्र है । २९. क्षितिज और अहोरात्र वृत्त के सम्पात बिन्दु से पूर्व स्वस्तिक तक क्षितिज वृत्तीय चाप का नाम अग्रा चाप है । ३०. इसी प्रकार क्षितिज और दृग्वृत्त के सम्पात से पूर्व स्वस्तिक तक क्षितिज वृत्तीय चाप का नाम दिगंश चाप है । ३१. भूगोल केन्द्र से अपने खमध्य तक गए हुए सूत्र को ऊर्ध्वाधर सूत्र कहते हैं । एवं भूगर्भ से निरक्ष खमध्य तक गये सूत्र को निरक्षोर्ध्वाधर सूत्र कहते हैं । ३२. इसी प्रकार भूगर्भ से, पूर्व स्वस्तिक तक गत वायु रूप सूत्र का नाम पूर्वापर सूत्र, ध्रुव स्थान गत सूत्र का नाम ध्रुव सूत्र या ध्रुव यष्टि (Polar Axis) समस्थान गत सूत्र का नाम सम सूत्र, कोणवृत्त क्षितिज सम्पात गत सूत्र का नाम कोण सूत्र, दृग्मण्डल क्षितिज सम्पातगत सूत्र का नाम दृक्कुज सूत्र, भूगर्भ से क्षितिज अहोरात्र वृत्त सम्पात गत सूत्र का नाम स्वोदयास्तसूत्र, उन्मण्डल अहोरात्र सम्पात गतसूत्र का नाम निरक्षो- दयास्त सूत्र और भूगर्भ से इष्ट स्थान तक गये सूत्र का नाम इष्ट सूत्र हैं । ३३. याम्योत्तर अहोरात्रवृत्त सम्पातस्थ ग्रह बिम्ब केन्द्र से उदयास्त सूत्र के ऊपर लम्ब रूप सूत्र का नाम हृति है तथा पूर्वापर अहोरात्र वृत्त सम्पात से स्वोदयास्त सूत्र पर लम्ब सूत्र का नाम तद्धृति है एवं किसी भी इष्ट स्थानीय ग्रहबिम्ब से स्वोदयास्त सूत्र पर लम्बरूप सूत्र को इष्ट हृति कहते हैं । ३४ निरक्षोदयास्त सूत्र तक उक्त इष्टहृति आदि के खण्डों का नाम कला है यह सब द्युज्या वृत्तीय लघुवृत्तीय होते हैं । अतः ग्रहगणित के उपयोग के लिए इनका मान त्रिज्यावृत्त अर्थात् बृहद्वृत्त में परिणत कर बृहद्वृत्तीय किया जाता है । ३५. द्युज्यावृत्तीय हृति का त्रिज्यावृत्तीय परिणत स्वरूप अन्त्या होता है । ३६. सर्वत्र पूर्वापर और स्वोदयास्त सूत्रों का अन्तर अग्रा होती है । पूर्वापर और निरक्षोदयास्त सूत्रों का अन्तर क्रान्ति ज्या होती है । निरक्षोदयास्त और स्वोदयास्त सूत्रों का अन्तर कुज्या होती है । ३७. इष्ट स्थानीय ग्रह बिम्ब से स्वोदयास्त सूत्र तक गये हुए सूत्र को इष्ट शंकु कहते हैं । यह शंकु अनेक स्थानों से अनेक प्रकार के होते हैं । मुख्यतः पूर्वापराह्रोरात्र-वृत्त सम्पात से क्षितिज धरातलगत सूत्र को पूर्वापर शंकु (समशंकु) एवं याम्योत्तराहोत्र-वृत्त

( ५५ ) सम्पात से क्षितिज धरातलगत सूत्र की मध्याह्न शंकु, कोणवृत्ताहोरात्रवृत्तसम्पात से क्षितिज धरातलगत शंकु का नामकोण शंकु होता है । ३८. शंकुमूल से स्वोदयास्त सूत्र तक लम्ब रूप याम्योत्तर अन्तर को शंकुतल कहते हैं । इस प्रकार इष्टशंकु कोटि, इष्टहृति कर्ण एवं इष्टशंकुतल भुज ऐसे बहुविध सरल समकोणक त्रिभुजों की खगोलीय बहुविध रचनाओं से तत्तत्स्थलों की छाया आदि ज्ञात करते हुये ग्रहगोलगणित की पृष्ठभूमि सुदृढ़ होती है । इस प्रकार संक्षेप से खगोल का परिचय करते हुये तथा पौर्वात्य पाश्चात्य खगोलीय ऊपर लिखित शब्द संकेतों की सूची से मेरा विश्वास है कि ग्रन्थ में वर्णित ग्रहगणित के विशेष परिष्कारों से सर्वसाधारण को अवश्य लाभ होगा, जिसे मैं अपना सफल प्रयास समझूँगा । वस्तुतः प्राचीन परम्परा से ही भारतीय ग्रन्थ भण्डार की ज्ञानप्राप्ति के लिए गुरु- मुख होना तो अनिवार्य है । बिना गुरुमुख हुये ग्रन्थ की विशेष फक्किकाएँ समझ में नहीं आ सकती हैं । ग्रन्थ का हृदय तो गुरु का हृदय है और उस हृदय को, विनीत जिज्ञासु परम गुरु भक्त सुयोग्य शिष्य ही प्राप्त कर सकता है । इसीलिए आचार्यों ने बड़े श्रम साध्य ग्रन्थ के क्लिष्ट स्थलों को समझ कर सरल बनाते हुये शिष्य परम्परा से अनुरोध किया है कि (“नैतद्देयं दुर्विनीताय शिष्याय” तथा दिव्यं ज्ञानमतीन्द्रियमित्यादि) इस पवित्र ज्ञान को शिष्यत्व समझकर सुविनीत शिष्य को ही देना चाहिये । ८. त्रिप्रश्नवासनाधिकार—'त्रिप्रश्न' शब्द से भूमण्डल में दिशा, देश, काल का परिचय होता है । ग्रहगोलाध्याय के त्रिप्रश्नाधिकार में कहा गया है— उन्मण्डलक्ष्मावलयान्तराले द्युरावृत्ते चरखण्डकालः । तज्ज्याऽत्र कुज्या चरशिञ्जिनी स्याद्व्यासार्धवृत्ते परिणामिता सा ॥ अर्थात भूमण्डल के किसी नियत स्थानीय क्षितिज और विषुवत वृत्तनिष्ठ क्षितिज के बीच में अहोरात्र वृत्त (जिसका काल = ६० घटी अर्थात २४ घण्टा) के एक लघु टुकड़े का नाम चर कहा गया है । अतः ६ घण्टे के समय में इस चर खण्ड को अधिक और कम तुल्य समयों में अपने देशों में सूर्योदय, सूर्यास्त, अर्धरात्रि या मध्याह्न का समय ज्ञान विवेचित किया है । ग्रहगोल की भाषा में इस त्रिप्रश्नवासनाधिकार को 'कालतंत्र' भी कहा गया है । विशेषकर के इस प्रकरण में दिन-रात्रि की लघु महत्ता का कारण, ६६ अंश अक्षांश से अधिक अंशीय देशों में लम्बांश से अधिक क्रांति होने पर उन देशों में दीर्घकालीन

( ५६ ) दिन-रात्रि, उत्तर-दक्षिण ध्रुवों में मानव मात्र के ६ महीनों में मात्र एक दिन और रात्रि, पृथ्वी में ध्रुवतारा का स्थान आदि के विचार के साथ ही इसी प्रकार चन्द्रपृष्ठ में मानव मान के एक चान्द्रमास के तुल्य पितृ लोक में पितरों का एक दिन, उत्तरायण, दक्षिणायन व्यवस्था, चन्द्रमा के ऊर्ध्व भाग में पितरों की स्थिति, कृष्ण पक्ष की साझें सप्तमी को पितृलोक में सूर्योदय, अमान्त में मध्याह्न आदि का विवेचन किया गया है। ब्रह्माण्ड में ऐसा स्थान जहाँ पर सदा सूर्य दर्शन होता है (सदोदित रवि दर्शन) उस स्थान का ज्ञान, लग्न साधन, लग्न साधन में सूर्य तात्कालिककरण, देश विशेष से सदोदित राशियों का आंकलन, दृश्या-दृश्य राशियों के वर्णन में लल्लाचार्य की गणितीय त्रुटियों का वर्णन, शंकु स्थान, दीर्ज्या, कुज्या, अग्रा, क्रांति क्षेत्र आदि की परिभाषा और आठ प्रकार के सजातीय अक्ष क्षेत्रीय त्रिभुजों का स्थान वर्णन के साथ गोलाध्याय में इस अधिकार का समापन हुआ है। उक्त इसी प्रकार के गणित वर्णनों के साथ सूर्य और लग्न ज्ञान से इष्टकाल ज्ञान, भूपृष्ठीय किसी नगर में छाया ज्ञान से पूर्वादि दिशाज्ञान, सजातीय आठ अक्ष क्षेत्रों का परिचय, नाना प्रकार के गणितों का परिष्कार इत्यादि गोलाध्याय की अपेक्षा ग्रह- गणिताध्याय से त्रिपश्नाधिकार विशद् और अधिक व्यापक है। ९. ग्रहणवासना—गोलाध्याय में 'अथ ग्रहणवासना' शीर्षक से ग्रहणवासना अध्याय का आरम्भ हुआ है एवं इस अध्याय में सूर्यग्रहण पर ही आचार्य ने विशेष परिष्कारों से अध्याय को विभूषित किया है। चन्द्र-सूर्य ग्रहण की स्पर्श मोक्ष दिशायें और चन्द्रग्रहण में पृथ्वी छाया का दीर्घ विस्तार का ज्ञान, आकाशस्थ ग्रहणों का परलेख चित्र से विचार, लम्बन, स्पष्ट लम्बन गणित ज्ञान, बलन ज्ञान, बलन गणित में लल्लाचार्य की भयंकर त्रुटियों का दर्शन पूर्वक शुद्ध स्पष्ट बलन ज्ञान के साथ इस अध्याय का समापन हुआ है। यद्यपि ग्रहगणिताध्याय में सूर्य-चन्द्रग्रहण-गणित साधन में पर्वसंभवाधिकार, चन्द्र- ग्रहणाधिकार और सूर्यग्रहणाधिकार नाम के अध्यायों में गोलाध्याय की अपेक्षा सविशेष वर्णन हुआ है। ग्रहगणिताध्याय में सूर्यग्रहण के उपसंहार के समय में अपने गुरु परम्परा के ब्रह्म- गुप्ताचार्य के दृक्क्षेप साधन की स्थूलता या त्रुटि का भी उल्लेख उदाहरण पूर्वक आचार्य भास्कर ने किया है। जो निम्न भाँति द्रष्टव्य है—

( ५७ ) स्थानीय शर का भी संस्कार करना चाहिए" "ऐसा मत" यह मत मेरा नहीं है। यह मत पूर्ववर्ती मेरे माननीय ब्रह्मगुप्ताचार्य का है। अतएव मेरे मत से चन्द्रदृक्क्षेप में वित्रिभ लग्न शर का संस्कार नहीं करना चाहिए। क्यों नहीं करना चाहिए ? इसलिए युक्ति देता हूँ कि २४ अक्षांशीय देशों में उदय काल में तुला राशिस्थ सूर्य चन्द्र और पात भी हैं। पूर्वापर वृत्तानुसारि कान्ति वृत्त में यह स्थिति होती है। यहाँ ऐसी स्थिति में रवि प्राक्स्वस्तिक में तथा वित्रिभ लग्न सममण्डल, खमध्य में है कान्ति- मण्डल और दृङ्मण्डल ये तीनों वृत्तों का एक ही स्वरूप है, या ये एकाकारक हैं। स्पष्ट शर भी यहाँ शून्य है एवं यहाँ शर का अभाव है। इस नति का यहाँ तथा वित्रिभ लग्न के शर से संस्कृत नति का यहाँ पर ४ कला के तुल्य जो माना जाता है वह सब व्यर्थ है अर्थात् प्रयोजनाभाव है इत्यादि युक्तियों से वित्रिभ शर संस्कृत नति का प्रयोजनाभाव होने से ब्रह्मगुप्ताचार्य का मत समीचीन नहीं है यही आचार्य भास्कर का भाव है। क्षेत्रगत वासना के साथ उदाहरण सहित आचार्य ब्रह्मगुप्ताचार्य के मत की असमीचीनता का स्पष्टीकरण कर रहा हूँ। जैसे—यद्यपि ब्रह्मगुप्त के ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त को आगम मान कर भास्कराचार्य ने इस ग्रन्थ का प्रणयन किया है तथा ब्रह्मगुप्त के गोलगणित के वैदुष्य पर भास्कराचार्य ने बड़ी आस्था यत्र तत्र सर्वत्र भी प्रगट की है किन्तु महान् गणितज्ञों की भी गणितगोल की स्थूलता का आचार्य ने सदोष उल्लेख करते हुए इसकी सूक्ष्मता के गणित उपायों की अच्छी विधि हम लोगों को दी हैं। यहाँ पर चन्द्रदृक्क्षेप साधन में वित्रिभ लग्न शर का संस्कार प्रत्यक्ष बाधक और व्यर्थ भी है आचार्य ने यही बताया है। आचार्य ने वस्तु तथ्य को सामने रखा है और स्थूल पक्ष जो मैंने कहा है वह पूर्व परम्परा से लिखा हूँ। यह मेरा स्वतन्त्र मत नहीं है इत्यादि कहते हुए अपने पूर्व के आदरणीय श्री ब्रह्मगुप्ताचार्य का दोष निम्न भाँति स्पष्ट किया है— कल्पना करिये कि— सं पू स प = क्षितिज वृत्त हैं । सं ख नि स = याम्योत्तर वृत्त है । पू ख प = पूर्वापर वृत्त है । पू नि प = विषुव वृत्त है ।

( ५८ ) याम्योत्तर और पूर्वापर वृत्त का संपात बिन्दु का संकेत बिन्दु न बिन्दु है । पू र्स ख नि स प जिस देश में अक्षांश (२४) चौबीस अंश के तुल्य है (यह देश प्रायः विन्ध्य पर्वत के आसन्न काशी से दक्षिण हो सकते हैं) उस देश में किसी इष्ट समय में स्पष्ट रवि = ६।०'।०'।०'' स्पष्ट चन्द्रमा = ६।०'।०'।०'' पात = ६।०'।०'।०'' इस समय रवि के उदय के समय सूर्य चन्द्रमा और पात पूर्व स्वस्तिक में होते हैं । इस समय उदय लग्न = ६।०'।०'।०'' चन्द्रमा का शर = ०' लग्न - ३रा वित्रिभ लग्न = ६।०'।०'।०'' - ३।०'।०'।०'' वित्रिभ लग्न की क्रान्ति = १२° + ८° + ४° = २४° चौबीस अंश (स्वल्पान्तर से) अतः खमध्य स्थान में स्थित क्रान्ति वृत्त की एकता है यहाँ यह दोनों एक ही वृत्त में होते हैं। इसी क्रान्ति वृत्त के सम्पात बिन्दु पर राश्यादिक पात भी हैं और यहीं चन्द्रमा भी स्थित है। इसी स्थान पर लंबित चन्द्रमा भी क्रान्तिवृत्त में ही लम्बित होगा । यहाँ चन्द्रमा लम्बित हुए भी दृग्वृत्तानुरूप क्रान्तिवृत्त से पृथक नहीं हो सकता । अतः ऐसी स्थिति में याम्योत्तर अन्तर रूप नति का युक्तितः स्पष्ट अभाव भी प्रत्यक्ष है जो स्वतः सिद्ध होता है । किन्तु इस स्थल पर ब्रह्मगुप्त के मत से ४ कला के तुल्य नति का मान आता है जिसका यहाँ कोई प्रयोजन नहीं होने से ब्रह्मगुप्त का यह नति साधन मान गणित प्रपञ्च व्यर्थ हैं। इसलिए ब्रह्मगुप्त का उक्त कथन समीचीन नहीं है। भास्कराचार्य ने नति ४ कला आती है ऐसा ही कहा है ।

( ५९ ) चार कला नति कैसे आती है ? इसे निम्न गणित से समझिये । सपात वित्रिभ का भुज = ९०° वित्रिभ का शर = २७०° इसकी ज्या = २६९।३१ स्वल्पान्तर से ज्या = २७० रवि का दृक्क्षेप = ० । अतः चन्द्रमा का दृक्क्षेप = ० + २७० = २७० अतः नति उत्पादक गणित सिद्धान्त से— (चन्द्रदृक्क्षेप × चन्द्रदृग्लम्बनज्या) / चन्द्रदृग्ज्या = चन्द्रगति / १५ × २७० / ३४३८ = {(७९०।३५) २७०} / (१५ × ३४३८) = {(७९०।३५) २७०} / (१५ × ३४३८) = ४ (स्वल्पान्तर से) अतः ब्रह्मगुप्त के दोष को स्पष्ट करते हुए आचार्य भास्कर ने अपना युक्ति युक्त गणित का कथन स्पष्ट किया है । १०. उदयास्तवासना—गोलाध्याय में ग्रहों के उदय एवं अस्त सम्बन्धित गणितों का स्पष्टीकरण किया गया है । चूंकि सूर्यग्रहण को छोड़कर शेष सभी ग्रह अनन्त ब्रह्माण्ड के अनन्त विमण्डल वृत्तों में भ्रमण करते हैं । समस्त ब्रह्माण्ड के ग्रह कक्षाओं का राश्यादिक स्थान अपने दृष्टिगत क्रांति वृत्त में होता है । विमण्डलगत ग्रह बिम्ब की राश्यादिक नियतस्थिति क्रांति वृत्त में कही गई है जिसे ग्रह का स्थान कहते हैं । अतः क्षितिज में ग्रहबिम्ब के उदय के पूर्व या पश्चात् ग्रहस्थान का उदय होता है । सारा गणित दृश्य है, बिम्ब दर्शन से ही प्रतीति होती है कि बिम्बोदय हुआ किन्तु गणितागत- ग्रहस्थान भिन्न होने से स्थानाभिप्रायिक ग्रह कदाचित् बिम्ब के साथ याम्योत्तर रूप में क्षितिज में है या बिम्ब पहले उदय होगा इत्यादि स्थानोदय एवं बिम्बोदय के अन्तर- काल का गणित इस अध्याय में हुआ है । इसी प्रकार ग्रहगणिताध्याय में ग्रहों का नित्यो- दयास्त और सूर्य के समीप एवं दूर के दूरी से अन्तरित उदयास्त, बुध, शुक्र का वक्रादि ज्ञान, ग्रहों के उदय व अस्त के कालांश ज्ञान इत्यादि का सविशेष वर्णन हुआ है । गोलाध्याय में 'ग्रहणवासना' के अनन्तर उदयास्तवासना है जबकि ग्रहगणिताध्याय में 'छायाधिकार' के पश्चात् उदयास्ताधिकार का वर्णन है । ग्रहगणिताध्याय के ग्रहछाया- धिकार में आचार्य ने एक कौशलपूर्ण गणित की सूक्ष्मता दर्शायी है जो पूर्वाचार्यों से प्रकाश में नहीं आई थी । जो निम्न है— भूकेन्द्राभिप्रायिक ग्रह गणित से शंकु मान का गणित भी गर्भाभिप्रायिक होता है जिसे भूगर्भ, भूपृष्ठ भेद से अन्तरित होना चाहिए । छाया दर्शन शंकु निवेशन···यह सब भूपृष्ठ बिन्दु (जो भूपृष्ठ में जहाँ है वहां से) से ही सही होता है । यहाँ शंकु कोटि, दृग्ज्या भुज कर्ण और १२ अंगुल और त्रिज्या कोटि, शङ्कु छाया, भुज एवं (भूपृष्ठस्थ) छाया कर्ण ही उसकी कर्णमान सही होती है । अतः शास्त्र शोध नियमों से बृहज्ज्या

( ६० ) साधित महाशंकु में जिस ग्रह की छाया ज्ञात करनी है उस ग्रह की गति का पञ्चदशांश (पन्द्रहवाँ भाग) उस ग्रह शंकु में कम करने से शेष तुल्य स्पष्ट शंकु मान होता । लघु शंकु साधन में यदि लघु ज्या से साधित शंकु में ग्रहगणित का ४३० वाँ भाग कम करने से वह स्पष्ट लघु शंकु होता है । उक्त दोनों प्रकारों से साधित शंकुओं से साधित दृग्ज्या को १२ से गुणा कर साधित शंकुओं से भाग भाग देने से छाया का मान स्पष्ट होता है । तब छाया² + १२² = कर्ण² का मूल छाया का मान स्पष्ट होता है । पूर्वाचार्यों का यहाँ पर का गर्भीय गणित कहने के लिये स्थूल कहा जा सकता है जिसे स्वल्पान्तर या नगण्य दोष भी कह सकते हैं । चन्द्र बिम्ब की दृश्यता काल साधन में हो तो उक्त संशोधन आवश्यक होगा । क्षेत्र देखिये— [चित्र: ख (शीर्ष) ग्र (ग्रह-बिम्ब) क समानांतर क्षितिज १२ च पृष्ठीय क्षितिज पृ गर्भीय क्षितिज ल' ल भू] (ल भू × १२) / वि ल = इष्ट छाया, अर्थात् (दृग्ज्या × १२) / गर्भीय शंकु किन्तु गर्भीय शंकु - लम्बन कला = भू पृ की कला । अतः (दृग्ज्या × १२) / पृष्ठीय शंकु = इष्ट समय में छाया । वस्तुतः इष्ट छाया साधन में गर्भीय शंकु = पृष्ठीय शंकु मान कर प्राचीनों के छाया साधन में कुछ स्थूलता कहने को हो जाती है जिसे "स्वल्प की आन्तरित त्रुटि जो

( ६१ ) अव्यवहारिक भी है वह दोष नहीं कहा जाता।” इस कथन में यत्र तत्र स्थल विशेष के गणितों में सभी आचार्यों से स्वल्पान्तरित दोष जो मात्र कहने के लिए ही है कहते हुये भी भास्कराचार्य ने इस स्थल पर गणित सूक्ष्मता के लिए स्वल्पान्तर दोष का साहस के साथ उद्घाटन कर ही दिया है। जो मननशील पाठकों के लिए अत्यन्त उपयोगी भी है। ११. शृङ्गोन्नतिवासना—सूर्य किरणों से सूर्य की दिशा की तरफ अमृत का पिण्ड, यह चन्द्रबिम्ब आधे बिम्ब से कम प्रकाशमान दिखाई देता है। तद्विरुद्ध दिशाओं में छायारूप अन्धकार रहता है। सूर्य कक्षा से चन्द्रमा की कक्षा नीचे भूमि के समीप है। नीचे रहने वाला यह दृश्य चन्द्रबिम्ब अमान्त काल में अन्धकारमय और पूर्णान्त काल में आधा उज्ज्वल और दृश्य होता है तथा सूर्य प्रकाश से १२ अंश से आगे की दूरी पर शुक्ल पक्ष की द्वितीया को नाखून के आकार का शृंगाकार चन्द्रमा पश्चिम क्षितिज में सूर्यास्त के बाद दृश्य होता है जिसे दूज का चांद या ईद का चांद से लोग कहकर अपने व्यवहार में उपयोग करते हैं, इत्यादि विषयों का लघु विवेचन इस गोलाध्याय में हुआ है। गणिताध्याय में चन्द्र शंकु साधन, सूर्य का शंकु और शंकुतल का साधन, भुज साधन, कोटि साधन, दिग् बल ज्ञान, शृंगदर्शन योग्य परलेख साधन के साधन ब्रह्मगुप्ता- चार्य के ब्रह्मसिद्धान्त के और चन्द्रशृंग साधन में भुज कोटि साधन में स्थूलता बताते हुए सही गणित की गवेषणा आचार्य ने की है। गणिताध्याय एवं गोलाध्याय में आचार्य से भी इस चन्द्र शृंगोन्नति साधन में कुछ त्रुटि सो हुई है इस विषय को सुस्पष्ट समझने के लिए गणक सार्वभौम 'गुरुणां गुरु' महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी रचित 'वास्तव चन्द्र शृंग

( ६२ ) के + ∠ पृ स्पं के + कोण स्प. क स्पं. तुल्य अर्थात् ३६० अंशों ४ समकोणों में दो सम- कोण से अधिक को कम करते हैं घटाते हैं तो भू स्प चं. स्प चतुर्भुज के चारों कोणों के योग में ३६० - १८० अंश से अधिक घटाने पर दो समकोण से कम अर्थात् स्प भू स्पं कोण का मान दो समकोण से कम होता है अर्थात् दृश्य विम्ब का मान आधे से कम सिद्ध होता है । १२. यंत्राध्याय—गोलाध्याय के इस प्रकरण में दिनगत और दिनशेष समयों का ज्ञान किया गया है । गोल यन्त्र से लग्न का मान स्पष्ट किया गया है । ताम्र धातु के कटोरानुमा एक प्रामाणिक एक ऐसा पात्र जिसके तले में ऐसा छिद्र हो जो प्रथम सूर्योदय से द्वितीय सूर्योदय तक ६० मर्तबे स्थापित जलपात्र में डूबता रहे, यही घटी है । चक्रयन्त्र, अर्ध चापयन्त्र, चापयन्त्र का आधा तुरीय यन्त्र, आचार्य से निर्मित अतिकौशल प्रदर्शक फलक यन्त्र, यष्टि यन्त्र, सूर्यदर्शन (इष्टकालिक सूर्य की छाया) दिग्देश काल का ज्ञान, यष्टि यन्त्र से ध्रुववेध द्वारा पलभा का ज्ञान, वंश (बाँस) वेध से नाना प्रकार के वेध गणितफल और स्वयंवह आदि वैज्ञानिक यन्त्रों के निर्माण और उनके उपयोग की व्यवस्था इस प्रकरण में हुई हैं। केवल १२ अंगुल की सूचि आकार की लकड़ी से किसी भी समय भूपृष्ठ में छाया नापकर सूर्यग्रह की इदम् इत्थम् की स्थिति बताई गई है। चूंकि वर्ष में ऐसी स्थितियाँ चार बार हो सकती है तो इस छाया वेध से रवि भुजांश ज्ञान की स्थिति (मार्च, अप्रैल, मई की है या जून, जुलाई, अगस्त की है या आगे)

( ६३ ) प्राकृतिक ऋतुओं के चिह्नों से जाननी चाहिए। अतएव आचार्य ने इसी प्रसंग में ‘ऋतु- वर्णनाध्याय’ नामक अध्याय का इस गोलाध्याय में निवेश किया है। ग्रहगणिताध्याय में यह विषय नहीं है। १३. ऋतुवर्णनाध्याय—ग्रहगोलाध्याय के इस प्रकरण में ६ ऋतुओं का वर्णन किया गया है। मकर-कुंभ के सूर्य में शिशिर, मीन-मेष में वसन्त, वृष-मिथुन में ग्रीष्म, कर्क-सिंह में वर्षा, कन्या-तुला में शरद एवं वृश्चिक-धनु के सूर्य में हेमन्त ऋतुयें होती हैं। खगोल मर्मज्ञता के साथ साहित्य शास्त्र की अशेष पाण्डित्य शैली का आचार्य भास्कर में विद्यमान थी। अतएव इस कथन में लेशमात्र सन्देह नहीं है कि प्राचीन ग्रन्थ प्रणेता आचार्य सर्वशास्त्रज्ञ होते थे। काश ! संस्कूत वाङ्गमय का यह समय विचारणीय व शोचनीय है। ग्रहगणिताध्याय में शृंगोन्नत्ति अधिकार के पश्चात् ग्रहयुत्याधिकार के वर्णन में ग्रहों के मध्यम बिम्ब, बिम्ब स्पष्टीकरण, ग्रहों का योग साधन इत्यादि विषयों का वर्णन हुआ है। तदुपरि भग्रहयुत्तधिकार में नक्षत्रों के ध्रुवक, शर, नक्षत्र ग्रहों का योग इत्यादि का विचार है तत्पश्चात् गणिताध्याय के अन्तिम प्रकरण पाताधिकार में गोलायनसन्धि, क्रांतिसाम्य, व्यतिपात वैधृत आदि विषयों से गणिताध्याय का आचार्य ने समापन किया है। १४. प्रश्नाध्याय—ग्रहगोलाध्याय के इस प्रकरण में प्रश्नारम्भ का प्रयोजन, बुद्धि- मान दैवज्ञों की प्रशंसा, अनेक प्रकार के खगोलीय प्रश्नों और उनके शंका-समाधान के साथ प्रश्नों के उत्तरों से विभूषित यह प्रश्नाध्याय पाठकों के लिए विवेचनीय, मननीय एवं विचारणीय है। समग्र ग्रन्थ के आमूल चूड अध्ययन से अध्येता की ग्रहगोल गणित रूप की यह सम्पत्ति सदा वर्धमान होती रहेगी। ग्रहगणिताध्याय में त्रिप्रश्नाधिकार में ही इस प्रश्नाध्याय का समावेश है। इस प्रकार ग्रहगोलाध्याय एवं ग्रहगणिताध्याय के प्रकरणों के समन्वयात्मक अध्ययन एवं विवेचन से पाठकों को महान् गणितज्ञ भास्कराचार्य के वैदुस्वपूर्ण शोध गणित कर्म का आभास होगा। भास्कराचार्य ने अपनी "सिद्धान्तशिरोमणि” ग्रन्थ की "वासना भाष्य” नामक व्याख्या की। नीचे इस सन्दर्भ में संक्षिस वर्णन दिया जा रहा है— सिद्धान्त शिरोमणि और उसका वासना भाष्य भास्कराचार्य ने स्वरचित पद्यात्मक गणित सिद्धान्तों को स्पष्ट करने के लिये “वासना भाष्य” नामक व्याख्या भी स्वयं की है। आचार्य की स्वयं की इस व्याख्या का नाम उत्पन्न गणित सिद्धान्त के उपपादन का नामकरण "वासना भाष्य” क्यों हुआ होगा ? विचारणीय है।

( ६४ ) “उपपत्ति युतं गणितं गणका जगुः” निराधार का या अटकलपच्चू का गणित, गणित नहीं होता, किसी भी गणित का कोई मूलाधार होना चाहिए । वस्तुतः “वासना” इस शब्द के अनेक अर्थों में, प्रत्याशा, ज्ञान, भाव या संस्कार स्मृति, हेतु, कारण, कामना, उपपत्ति तर्क द्वारा किसी सिद्धान्त का सही उपपादन, कार्य से कारण का ज्ञान, अनुमान, प्रत्यक्ष, मेल, मिलन, सङ्गति युक्ति, प्राप्ति और प्रसिद्धि इत्यादि अनेक अर्थों से सम्बन्धित शब्द का नाम आचार्य ने “वासना” नामक सुन्दर शब्द से “वासना” भाष्य किया है । उक्त पर्यायवाची शब्द और उनके समान अर्थों से सम्बन्धित यह “वासना” शब्द आचार्य को अधिक प्रिय हुआ है । श्लोकबद्ध मूल ग्रहगणित सिद्धान्तों की उपपत्ति समझने में शिष्य वर्ग की कठिनता को ध्यान में रखकर आचार्य ने कठिन ग्रहगणित के श्लोकात्मक सिद्धान्तों को अपने इस “वासना भाष्य” से छात्र वर्ग का जो हित किया है पठनशील गुरु शिष्य परम्परा इसे स्वयं समझ कर आनन्दानुभव से शास्त्रज्ञान विवर्द्धक शोध कार्यों में तन्मयता से प्रवृत्त होकर रहेगी शुभाशा है । भास्कराचार्य के पूर्व एवं पश्चात् के जिन ग्रहगणित खगोलज्ञों में भास्कराचार्य ने जिन रचनाओं को प्रमाणीभूत माना है और भास्कराचार्य को जिन आचार्यों ने प्रमाणी- भूत माना है उन एव अन्य ग्रहगणित खगोल ग्रन्थ प्रणेता महान् आचार्यों का संक्षिप्त परिचय इस स्थल पर दे देना आवश्यक समझकर प्रस्तुत कर रहा हूँ और जो प्रसंगत अत्यन्त उचित भी है । प्रस्तुत प्रकरण का इसी लेखनी से लिखित 'ग्रह लाघव' करण ग्रन्थ की 'केदारदत्तः' टीका की भूमिका में भी उल्लेख हुआ है :- भास्कराचार्य के पूर्ववर्ती ग्रहगणित-गोल आचार्यों का इतिवृत्त भास्कराचार्य के पूर्ववर्ती ग्रहगणित गोल आचार्यों में आचार्य लगध, आर्यभट्ट, लल्ला- चार्य, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, मुञ्जाल, श्रीपतिभट्ट, भास्कर प्रथम आदि प्रमुख हैं। उक्त आचार्यों का संक्षिप्त परिचय नीचे दिया जा रहा है— आचार्य लगध—ज्योतिष शास्त्र वेदमूलक हैं, षडंगों में चक्षुस्थानीय है । वर्तमान ज्योतिष का वेदमूलक ग्रन्थ आचार्य 'लगध' प्रणीत 'वेदाङ्ग ज्योतिष' ग्रन्थ है । उपलब्ध ज्योतिष ग्रन्थ कोश में आचार्य लगध प्रणीत यह ग्रन्थ ही आगम ग्रन्थ है । आचार्य लगध और उनके 'वेदाङ्ग ज्योतिष' नामक ग्रन्थ के सन्दर्भ में ऐतिहासिक विद्वानों में विवाद है जिसकी चर्चा यहाँ अनावश्यक है । आचार्य लगध ने 'वेदाङ्ग ज्योतिष' ग्रन्थ में ज्योतिष- शास्त्र के गणित स्कन्ध की स्तुति करते हुए कहा है कि वेदांग शास्त्रों में (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द और ज्योतिष) ज्योतिष (गणित) ही मूर्धन्य है ।

( ६५ ) "यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा, तद्वद्वेदाङ्गशास्त्राणां ज्योतिषं (गणितं) मूर्ध्नि संस्थितम् ।' 'वेदांग ज्योतिष' के अपने भाष्य में 'सोमाकर' ने भी ज्योतिष' की जगह 'गणित' कह कर ज्योतिष के गणित स्कन्ध को ही सर्वोपरि भी कहा है । वैदिक साहित्य एक गहन ज्ञान-विज्ञान का भण्डार है । वैदिक-साहित्य के प्रादुर्भाव की परम्परा भी स्वयम् में किसी काल-विशेष की अपेक्षा रखती है । इसलिए काल की भी वैदिक पद्धति प्रचलित हुई । "कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः" कालज्ञान बोधक ज्योतिषशास्त्र का वर्त्तमान विकसित स्वरूप आचार्य लगध मुनि की देन है। कालान्तर में ब्रह्मर्षि वेदव्यास ने जिस प्रकार श्रुति, स्मृति-पुराणों की रचना से ज्ञान संरक्षण एवं संवर्धन किया उसी प्रकार महात्मा लगध ने वेदाङ्ग ज्योतिष की रचना से ज्योतिष शास्त्र की प्रतिष्ठा अक्षुण्य की है । 'वेदाङ्ग ज्योतिष' (याजुष ज्योतिष) जो आचार्य लगध प्रणीत कहा जाता है तथा शास्त्रों में "कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः" से ऐसा सिद्ध होता है कि आचार्य लगध तपोनिष्ठ महात्मा थे । शब्दशास्त्र (व्याकरण) के विमल शब्द रूप जल धारा से अज्ञान अन्धकार को मिटाने वाले आचार्य पाणिनी की तरह प्रकाश स्वरूप ज्योतिष-ज्ञान द्वारा अन्धकार को धोने वाले महात्मा लगध कहे जाते हैं । लगधाचार्य ने परमाधिक दिनमान ३६ घटी = १४ घण्टा, २४ मिनट के तुल्य जो उल्लेख किया है, तदनुसार यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि लगधाचार्य उत्तर भारत के उत्तर हिमालय की किसी चोटी के समीपस्थ गुफा में तपोनिष्ठ थे । लगधाचार्य ग्रह वेध करने में भी कुशल खगोलज्ञ थे । उन्हीं के कथन से पुष्टि होती है । याजुष ज्योतिष में उल्लिखित है— "प्रपद्येते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक् दक्षिणार्कस्तु माघश्रावणयोः सदा ॥ श्लोक ७ ॥ तात्पर्य यह है कि सूर्य और चन्द्रमा जब धनिष्ठा नक्षत्र के आदि में होते हैं तब उत्तरायण और चित्रा नक्षत्र के आधे में होने से दक्षिणायन होता है अर्थात् सदा सूर्य चान्द्र मासों के सम्बन्ध में माघ चान्द्र मास में उत्तरायण एवं श्रावण मास में दक्षिणायन होना कहा गया है । तथा, पञ्चसंवत्सरमयं युगाध्यक्षं प्रजापतिम् । दिनर्वयनमासाङ्गं प्रणम्य शिरसा शुचिः ॥ १ ॥ ज्योतिशामयनं पुण्यं प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः । सम्मतं ब्राह्मणेन्द्राणां यज्ञकालस्यसिद्धये ॥ २ ॥ [याजुष ज्यो०] ५

( ६६ ) अर्थात्— समीचीन यज्ञकाल की सिद्धि के लिए पञ्चसंवत्सरात्मक युगाध्यक्ष शरीर के अवयव युक्त ब्रह्मा को प्रणाम कर दिन, मास, ऋतु, अयन और पुण्य पवित्र वेद नेत्र ब्राह्मणों से सम्मत शास्त्र का वर्णन करता हूँ। आचार्य के कथनानुसार ५ वर्ष का एक युग मानने से— एक युग में सौर वर्ष = ५ = रविभगण । एक युग में, ५ × १२ = ६० सौर मास ६० × ३० = १८०० दिन । एक युग में चान्द्रमास = सौर मास + २ चान्द्रमास = ६२ चान्द्रमास । अतः १८६० से एक युग में क्षय दिन = ३० तथा इस प्रकार एक युग में सावन दिन = १८६० - ३० = १८३० दिन । एक युग में नक्षत्रोदय = १८३० + ५ = १८३५ । ,, ,, ,, चन्द्रभगण = ६० ,, ,, ,, चान्द्र सावन दिन = १८३५ - ६७ = १७६८ । एक सौर वर्ष के सावन दिन = ३६६, एक सौर वर्ष के चान्द्र दिन = ३७२, एक सौर वर्ष के नक्षत्र दिन = ३६७ तथा एक अयन से द्वितीय अयन तक के सौर दिन = ३६० ÷ २ = १८० एक अयन सम्बन्धी १८० सौर दिन या सौर अंशों में नक्षत्र योग १३°।२०' १३ १/३ = ४०/३ का भाग देने से (३ × १८०) / ४० = २७ / २ = १३।३० १३ १/२ घनिष्ठादि गणना से द्वितीय अयनारम्भ अथवा मकर माघादि में उत्तर अयन से ६ महीने कर्कादिश्रावण में दक्षिणायन होना सोपपत्तिक सिद्ध होता है । “धर्मवृद्धिष्प्रपां प्रस्थः क्षपाह्रास उदगतौ········ अर्थात् उत्तरायण सूर्य में प्रतिदिन एक प्रस्थ के तुल्य दिन वृद्धि तथा तत्तुल्य रात्रि में ह्रास होता है । १८० × १ = १८० प्रस्थ तुल्य दिन रात्रि का ६ महीनों में क्रमशः वृद्धि-ह्रास हो सकेगा । सूर्य सञ्चार स्थिति में एक अयन से द्वितीय अयन पर्यन्त दिन और रात्रि मान ३०, ३० घटी होगा । अर्थात् ६ मुहूर्त्त = ६ × २ = १२ घटी (१ मुहूर्त्त = २ घटी) १ मुहूर्त्त के अनुसार दिन रात्रि के मान में ह्रास और वृद्धि होती हैं । जैसे यदि दिन मान = ३६ घटी, तो रात्रि मान = ६० - ३६ = २४ तथा रात्रिमान = ३६ तो दिन मान = ६० - ३६ = २४ । अर्थात् ३६ - २४ = १२ घटी = ६ मुहूर्त्त के तुल्य दिन और रात्रि की क्रमिक वृद्धि उत्तर दक्षिण अयनगत रवि में होगी ।

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इस प्रकार १५ घटी में ३ घटी तुल्य चर मान मानने से १५ + ३ = १८, १५ - ३ = १२ को द्विगुणित करने से ३६ घटी परम दिन मान एवं २४ घटी परमाल्प दिन का मान होता है । भूमण्डल के किस अक्षांश पर उक्त स्थिति घटित हो सकती है, गणित के आधार पर इसका ज्ञान आवश्यक है । जहाँ पर तीनों चर खण्डों का योग ३ घटी = १ घण्टा १२ मि० उस देश की पलभा से चर साधन क्रिया से यदि पलभा = ८ अंगुल २६ व्यंगुल तो ग्रहलाघव करण ग्रन्थ की चर साधन प्रक्रिया से सायन मेषादि सूर्य (प्रायः आजकल २३ मार्च) की पलभा से ८।२६ × १०, ८।२६ × ८, ८।२६ × १०/३ = स्वल्पान्तर से ८४, ६७, २८ अतः ८४ + ६८ + २८ = १८० पल ÷ ६० = ३ घटी चरमान होता है । उज्जयिनी की पलभा = ५।८, उक्त पलभा = ८।२६ दोनों का अन्तर = ३।१८ अर्थात् उज्जैन के अक्षांश २३।१० भूपृष्ठीय किसी भव्य तपोभूमि में उक्त वेदांग ज्योतिष प्रणेता आचार्य लगध ने जन्म लिया था या वहाँ तपस्या की थी । चापीय त्रिभुज गणित से चरज्या = (अक्षांश स्पर्श × क्रान्तिस्पर्श रेखा) / (त्रिज्या = व्यासार्ध) चूंकि चर = ३ और परमक्रान्ति तुल्य दिन में परम क्रान्ति प्राचीन गणितज्ञों के मत से = २४° अतः सूक्ष्म गणित साधन प्रक्रिया से अक्षांश मान = ३४.४५ सिद्ध होते हैं । फलतः इस गणित से अनुमानतः महात्मा लगध को हिमालय के 'कश्मीर व कैलास या बदरिकाश्रम की गुफाओं में इस ज्ञान की उपलब्धि हुई होगी । वेदांग ज्योतिष में मुहूर्त्त आदि ज्ञान के लिए वेध से समय ज्ञान का प्रकार ४२वें श्लोक में स्पष्ट है । "कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः" कथन से यह तो ज्ञात होता ही है कि आचार्य लगध हिमालय की गुफा में तप करते थे; साथ ही यह सम्भव है कि महात्मा लगध अमरनाथ काश्मीर या बद्रिकाश्रम के ज्योतिषपीठ में तप करते हुए ज्योतिषशास्त्र का ज्ञान भी प्रसारित करते रहे होंगे ? अर्थात् इस प्रकार से वर्त्तमान भारत का शिरोभाग सुदूर कश्मीर से भी उत्तर में वेदाङ्ग ज्योतिष की रचना का स्थान सिद्ध होता है । इससे यह भी फलित होता है कि प्राचीन भारतवर्ष की सीमा वर्त्तमान भारत की सीमा से और आगे उत्तर पश्चिम तक व्याप्त थी । वेदाङ्ग ज्योतिष प्रणेता के अनुसार ५ वर्ष के एक युग की मान्यता से ५ युग में उत्तरायण + दक्षिणायन = १० होती है । एक अयन से दूसरे अयन तक की दिन संख्या चान्द्रवर्ष सम्बन्धी दिन संख्याओं का अर्द्ध भाग होता है । अर्थात् एक चान्द्रवर्षीय चान्द्र-

( ६८ ) दिन संख्या = ३७२ का आधा = ३७२ ÷ २ = १८६, तिथियाँ होंगी । १८६ ÷ ३० = ६ चान्द्र महीने + ६ तिथियाँ होती हैं । प्रथमयन की तिथि में ६ जोड़ देने से द्वितीय- अयन तिथि का मान = ६ + १ + ६... = १।७।१३।१ ९।२५।१।७।१३।१ ९।२५ तिथियों में दूसरी अयन तिथि होगी, यह स्पष्ट है । माघशुक्ल प्रतिपद को प्रथम अयनारम्भ होने से १८६ + १ = १८७ ÷ ३० = ७ अर्थात् श्रावण शुक्ल सप्तमी को द्वितीय अयनारम्भ होना स्पष्ट है । इसी प्रकार तीसरा अयनारम्भ माघ शुक्ल त्रयोदशी को हो तो १८६ + १३ = १९९ ÷ ३० = शेष १९।१९-१५ = ४ अतः श्रावणकृष्ण चतुर्थी को द्वितीय अयन होना सिद्ध होता है । प्रथमं सप्तमं चाहुरयनाद्यं त्रयोदश । चतुर्थं दशमं चैव द्वियुग्माद्यं बहुलेऽप्यतो... इस प्रकार वेदाङ्ग सम्मत वर्त्तमान पञ्चाङ्ग प्रणाली पर उक्त युक्ति कितनी घटित हो रही है ? —इसपर पाठक स्वयं विचार करेंगे । आर्यभट्ट—वेदाङ्ग ज्योतिष के बाद “आर्यभट्ट” का ग्रहगणित का “आर्यभटीय” पौरुषेय ग्रन्थ उपलब्ध है । २३ वर्ष की अवस्था में अर्थात् शक् वर्ष ४२१ (ईस्वी सन् ४९९) में आर्यभट्ट ने ज्योतिष सिद्धान्त के ‘आर्यभटीय’ ग्रन्थ की रचना कर ली थी । आर्यभटीय में वर्गमूल व घनमूल आदि अंकगणित की प्रक्रिया सर्वांश सूक्ष्म मिलती है । ‘पृथ्वी अपने अक्ष पर भ्रमण करती है’’, यह बात सर्वप्रथम आर्यभट्ट ने ही कही । आर्यभट्ट के परवर्त्ती गणित आचार्यों में ‘लल्ल’, ‘ब्रह्मगुप्त’, ‘वराहमिहिर’ आदि आचार्य प्रमुख हैं । इन परवर्त्ती आचार्यों ने आर्यभट्ट के उक्त भू-भ्रमण मत का खण्डन तो नहीं किया, किन्तु स्पष्टतया समर्थन वाक्य भी उपलब्ध नहीं होते हैं । हाँ, “ग्रह का क्रम सूर्य केन्द्राभिप्रायिक है—” यह बात प्राचीन आचार्यों की बुद्धि में भी स्थिर थी । खगोलज्ञ आर्यभट्ट के वैशिष्ट्य सूचक स्मारक रूप में आज भी पटना के अति समीप या पटना से लगा हुआ एक गाँव है, जिसका नाम ‘खगोल’ ग्राम है । पुष्पपुर पटना के नालन्दा जैसे शिक्षा केन्द्र में रहते हुए आर्यभट्ट का इकाई से अरबों खरबों तक की अंक लेखन प्रणाली अपने आप में, अद्भुत कल्पना वैचित्र्य की द्योतक है । “क वर्गाक्षराणि वर्गेऽवर्गाक्षराणि कात् ङ मौ यः ख द्विनवके स्वरा नव वर्गेऽवर्गे नवान्त्यवर्गे वा ॥” संक्षेप रूप में आर्यभटीय अंक संकेत निम्न प्रकार हैं— क् + अ = क = १, ख = २, ग = ३, घ = ४, ङ = ५, च = ६, ञ = १०, ट = ११, ण = १५, त = १६, न = २०, प = २१, म = २५, ङ और म इमो ५ + २५ =