भारतकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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( ६२ ) के + ∠ पृ स्पं के + कोण स्प. क स्पं. तुल्य अर्थात् ३६० अंशों ४ समकोणों में दो सम- कोण से अधिक को कम करते हैं घटाते हैं तो भू स्प चं. स्प चतुर्भुज के चारों कोणों के योग में ३६० - १८० अंश से अधिक घटाने पर दो समकोण से कम अर्थात् स्प भू स्पं कोण का मान दो समकोण से कम होता है अर्थात् दृश्य विम्ब का मान आधे से कम सिद्ध होता है । १२. यंत्राध्याय—गोलाध्याय के इस प्रकरण में दिनगत और दिनशेष समयों का ज्ञान किया गया है । गोल यन्त्र से लग्न का मान स्पष्ट किया गया है । ताम्र धातु के कटोरानुमा एक प्रामाणिक एक ऐसा पात्र जिसके तले में ऐसा छिद्र हो जो प्रथम सूर्योदय से द्वितीय सूर्योदय तक ६० मर्तबे स्थापित जलपात्र में डूबता रहे, यही घटी है । चक्रयन्त्र, अर्ध चापयन्त्र, चापयन्त्र का आधा तुरीय यन्त्र, आचार्य से निर्मित अतिकौशल प्रदर्शक फलक यन्त्र, यष्टि यन्त्र, सूर्यदर्शन (इष्टकालिक सूर्य की छाया) दिग्देश काल का ज्ञान, यष्टि यन्त्र से ध्रुववेध द्वारा पलभा का ज्ञान, वंश (बाँस) वेध से नाना प्रकार के वेध गणितफल और स्वयंवह आदि वैज्ञानिक यन्त्रों के निर्माण और उनके उपयोग की व्यवस्था इस प्रकरण में हुई हैं। केवल १२ अंगुल की सूचि आकार की लकड़ी से किसी भी समय भूपृष्ठ में छाया नापकर सूर्यग्रह की इदम् इत्थम् की स्थिति बताई गई है। चूंकि वर्ष में ऐसी स्थितियाँ चार बार हो सकती है तो इस छाया वेध से रवि भुजांश ज्ञान की स्थिति (मार्च, अप्रैल, मई की है या जून, जुलाई, अगस्त की है या आगे)